मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जब जिंदगी का अंतिम पड़ाव आता है, तब एहसास होता है कि हमने अपना कीमती समय किन चीजों में गंवा दिया। जो झगड़े हमें तब बहुत बड़े लगते थे, वे अर्थहीन प्रतीत होते हैं। अहंकार हवा हो जाता है। उस क्षण में, केवल शांति और संतोष की चाहत होती है, जो हमने दौड़-धूप में खो दी थी। हम खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही दुनिया को अलविदा कहते हैं। वहीं अहंकार भी हवा हो जाता है। उस क्षण में, केवल शांति और संतोष की चाहत होती है, जो हमने दौड़-धूप में खो दी थी। हम खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही दुनिया को अलविदा कहते हैं।
जीवन का यह विरोधाभास हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाता है कि सबकुछ पाने की दौड़ में संतुलन बनाए रखें। भौतिकवादी लक्ष्यों का पीछा करना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें अपने मानवीय मूल्यों, शांति और रिश्तों की कीमत पर हासिल न करें। याद रखें कि असली धन संपत्ति में नहीं, बल्कि उन पलों में है जो हमने प्यार और शांति के साथ बिताए हैं। अहंकार को छोड़ें और जीवन को उसकी संपूर्णता में जिएं, क्योंकि अंत में, केवल आपकी आत्मा की शांति ही आपके साथ जाएगी।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

