मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जिस समाज में पाखंड मनोरंजन बन जाता है, वहां की शिक्षा मजाक बन जाती है क्योंकि पाखंड तथ्यों और तर्क पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह सिर्फ दिखावे और छलावा पर आधारित होता है। यह एक ऐसा माहौल बनाता है, जहां लोग सच और झूठ के बीच फर्क नहीं कर पाते और शिक्षा जैसे ज्ञान के आधार को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे समाज में पाखंड को ही ‘मनोरंजन’ का एक साधन समझा जाने लगता है, जिसके कारण तर्कशील सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जगह अंधविश्वास और झूठी बातें ले लेती हैं।
वहीं जिस समाज में पाखंड का बोलबाला हो, वहां ज्ञान और विवेक का कोई महत्व नहीं रहता। लोग किताबों से ज्ञान प्राप्त करने के बजाय शॉर्टकट और चमत्कारों पर भरोसा करते हैं। इसलिए समाज को इस दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए शिक्षा के महत्व को फिर से स्थापित करना होगा। लोगों को पाखंड और सच्चाई के बीच का फर्क समझना सिखाना होगा। जब तक लोग मनोरंजन के नाम पर पाखंड का उपभोग करते रहेंगे, तब तक शिक्षा का मजाक बनना जारी रहेगा। समाज की भलाई के लिए यह जरूरी है कि हम ज्ञान का सम्मान करें और पाखंड का बहिष्कार करें।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

