Thursday, February 26, 2026
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गलतियों से डरने की बजाय यदि उनका विश्लेषण करके उनसे सीख लिया जाए, तो यही भ्रम हमें बना सकता है मजबूत इंसान

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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गलतियाँ अक्सर हमारे भीतर डर और आत्म-आलोचना की भावना को जन्म देती हैं। हम सोचते हैं कि ‘मैं हमेशा गलतियाँ करता हूँ’ या ‘मैं किसी भी काम को ठीक से नहीं कर सकता’। यह नकारात्मक सोच हमें भयभीत कर देती है, जिससे हम भविष्य में कोई भी काम करने से कतराने लगते हैं। यह डर हमें अपने क्षमताओं पर संदेह करने पर मजबूर करता है, जिससे हमारा दिमाग एक चक्रव्यूह में फंस जाता है। एक गलती हो जाने के बाद, हम अक्सर उस पर अत्यधिक सोचना शुरू कर देते हैं। हम बार-बार सोचते हैं कि ‘अगर मैंने ऐसा न किया होता तो क्या होता?’, ‘मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था’। यह अत्यधिक सोचना हमें वर्तमान से दूर कर देता है और अतीत में फँसाए रखता है। कभी-कभी गलतियाँ जानकारी के अभाव में होती हैं।
वहीं जब हमें किसी विषय या परिस्थिति की पूरी जानकारी नहीं होती, तो गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। एक बार जब गलती हो जाती है, तो हमें पता चलता है कि हमारे पास पर्याप्त जानकारी नहीं थी। यह एहसास हमें भ्रमित कर देता है । गलतियाँ अक्सर दिमाग को भ्रम में डाल देती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह भ्रम एक चेतावनी भी है कि हमें रुककर सोचने और सही दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है। अगर हम अपनी गलतियों से डरने की बजाय उनका विश्लेषण करें और उनसे सीखें, तो यही भ्रम हमें अधिक समझदार और मजबूत इंसान बना सकता है। गलतियों से होने वाले भ्रम से बाहर निकलने का रास्ता खुद को माफ करने और भविष्य के लिए एक बेहतर रणनीति बनाने से होकर गुजरता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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