मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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शिक्षा मनुष्य के जीवन का सबसे कीमती तोहफा है, जो व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल देती है और संस्कार मनुष्य के जीवन का सार हैं। अच्छे संस्कारों द्वारा ही मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण और विकास होता है और जब मनुष्य में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होगा, तभी वह परिवार, समाज और देश का विकास कर सकेगा। परन्तु आज के समय में शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान तक ही सीमित रह गई है, जबकि शिक्षा का असली उद्देश्य चारित्रिक ज्ञान है, जो आज की इस भागदौड़ वाली जिंदगी में हम भूल चुके हैं । शिक्षा ज्ञान देती है और जीवन जीने का कौशल सिखाती है, जबकि संस्कार नैतिक मूल्यों, सही-गलत का बोध और सामाजिक व्यवहार सिखाते हैं, जिससे व्यक्ति एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनता है ।
शिक्षा और संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं, बिना संस्कारों के शिक्षा अधूरी है और केवल ज्ञान से व्यक्ति अच्छे कर्म नहीं कर सकता । एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज के निर्माण के लिए शिक्षा के साथ-साथ संस्कारवान होना बहुत आवश्यक है । शिक्षा और संस्कार दोनों ही ज़िंदगी जीने के मूल मंत्र हैं, शिक्षा कभी झुकने नहीं देगी और संस्कार कभी गिरने नहीं देंगे । सही शिक्षा हमें न केवल ज्ञान प्रदान करती है, बल्कि हमें सही और गलत का फर्क भी समझाती है। जब शिक्षा संस्कारों के साथ जुड़ती है, तब वह हमें अच्छे इंसान बनने की दिशा में मार्गदर्शन करती है। संस्कारों से भरपूर व्यक्ति समाज में आदर्श बनता है, क्योंकि वह न केवल अपनी अच्छाई दिखाता है, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

