मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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यह कहना गलत होगा कि आदमी को केवल धन का अहंकार है। व्यक्ति के जीवन में अहंकार के हजार रास्ते होते हैं। व्यक्ति को केवल धन का ही नहीं, बल्कि पद, शक्ति, ज्ञान, रूप-रंग या किसी भी अन्य विशेषता पर अहंकार हो सकता है। यह अहंकार तब उत्पन्न होता है । जब व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और इसके कारण समाज और रिश्तों में नकारात्मकता आती है तथा व्यक्ति विनाश की ओर बढ़ सकता है। अगर कोई तपस्वी है, तो उसने इसी बात का अहंकार पाल रखा है। दान करके दानी कहलाने का प्रचार प्रसार करना भी अहंकार कहलाता है ।
आदमी भले ही कह दे कि वह मंदिर का निर्माण करवा रहा है, लेकिन उसकी भावना मंदिर निर्माण की नहीं होती , बल्कि वह चाहता है कि मंदिर पर उसका नाम अंकित हो जाए। अपना नाम खुदवाने के चक्कर में वह हताश हो जाता है। आदमी का सारा प्रयास इसी में रहता है कि बस किसी तरह नाम कमा लिया जाए । अहंकार की बजाय एक अच्छे इंसान की पहचान उसके कर्मों और व्यवहार से होती है, खास तौर पर संकट या अच्छे समय में जब उसके असली गुण, ईमानदारी, नैतिकता और दूसरों के प्रति उसके बर्ताव से उसकी असलियत सामने आती है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

