मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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माता-पिता के जीवित रहते उनका सम्मान करना इंसान का कर्तव्य है और उनकी मृत्यु के बाद उनके नाम पर ‘मृत्यु भोज’ कराना एक सामाजिक कुप्रथा है, जो अक्सर दिखावे और सामाजिक दबाव के कारण होती है । मृत्यु भोज की जगह, यदि यही पैसा गरीबों की सहायता करने या परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर सदस्यों का साथ देने में लगा दी जाए तो यह सहयोग मृतक के नाम पर सच्चा सम्मान होगा । मृत्युभोज कराने से परिवार पर कर्ज चढ़ सकता है, जिससे आर्थिक व मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं । कई लोग परिवार या समाज में मृत्युभोज कराने के आदी हो गए हैं, इसलिए ना चाहते हुए भी कुछ लोग एक-दूसरे की देखा-देखी या दबाव में इस आयोजन को करते हैं।
हालांकि मृत्यु भोज की बजाय केवल दूर दराज से आए हुए मेहमानों के लिए भोजन की व्यवस्था करना एक अतिथि सत्कार है । जीते जी माता-पिता का अनादर व तिरस्कार करना और मृत्यु के बाद उनके लिए शोकभोज का आयोजन करना एक विरोधाभासी स्थिति है, जो दर्शाता है कि परिवार और समाज में संस्कारों का पतन हुआ है । मां बाप की ममता उस समय दम तोड़ देती है, जब बच्चे कहते हैं कि तुमने हमारे लिए किया ही क्या है ?, जबकि मां बाप अपने बच्चों की सुख सुविधा और उनका उज्जवल भविष्य बनाने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहते हैं । इसलिए तिरस्कार व अपमान करने और मरने पर भोज कराने” की बजाय जीते जी माता-पिता का सम्मान, सहयोग और सेवा करें, जो एक सर्वोच्च मानवीय कर्म और धर्म है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

