सुबह से भूखे-प्यासे बैठे लोग लौटते हैं मायूस, पारदर्शिता पर उठे सवाल
मूकनायक , बुद्धप्रकाश बौद्ध , जिला ब्यूरो चीफ भिंड-दतिया मप्र
दबोह, 10 सितंबर। तहसील दबोह में नायब तहसीलदार अरविंद शर्मा की लगातार अनुपस्थिति आम जनता के लिए सिरदर्द बन चुकी है। नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और कब्जा हटाने जैसे जरूरी कार्यों के लिए आने वाले ग्रामीण सुबह से भूखे-प्यासे कार्यालय में इंतजार करते रहते हैं, किंतु अधिकारी का चेहरा तक देखने को नहीं मिलता।
जनता पूछ रही– आखिर जिम्मेदार कौन?
नगर से 2 किलोमीटर दूर स्थित तहसील कार्यालय तक पहुंचना ही ग्रामीणों के लिए चुनौती है। महिलाएं और बुजुर्ग पसीना बहाकर पहुंचते हैं, मजदूर-किसान दिनभर की मजदूरी छोड़कर आते हैं, लेकिन शाम तक भी अधिकारी नदारद रहते हैं। सवाल यह है कि जनता को परेशान करने की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार आखिर कौन है?
कर्मचारी बनाते हैं बहाने, रिश्वत पर काम आसान
कार्यालय के कर्मचारी बार-बार यही रटा-रटाया जवाब देते हैं— “साहब छुट्टी पर हैं, कल आइए” या “साहब फील्ड में भ्रमण पर गए हैं”। हैरानी की बात यह है कि कागजों में कमी बताकर काम रोक दिए जाते हैं, लेकिन जब रिश्वत दी जाती है तो वही फाइल तुरंत निपटा दी जाती है। यह भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए काफी है।
सूचना पटल पर क्यों नहीं चिपकती छुट्टी ?
नागरिकों का आरोप है कि यदि अधिकारी छुट्टी पर हैं, तो इसकी सूचना सूचना पटल पर दर्ज होनी चाहिए। लेकिन न तो कोई सूचना चिपकाई जाती है और न ही पारदर्शिता की औपचारिकता निभाई जाती है। यह जनता को गुमराह करने और बेवजह परेशान करने का तरीका बन गया है।
पत्रकार की पड़ताल ने किया पर्दाफाश
मूकनायक के संवाददाता ने जब दोपहर 12 : 30 बजे तहसील कार्यालय का दौरा किया, तो नायब तहसीलदार अनुपस्थित मिले। मौजूद कर्मचारी भी छुट्टी की लिखित सूचना नहीं दिखा पाए। मोबाइल पर कई बार कॉल करने पर भी नायब तहसीलदार ने फोन रिसीव नहीं किया।
भूखे-प्यासे लोगों की गुहार
वार्ड नं. 6 दबोह से आए रामचरण दोहरे व उनकी पत्नी बोले—“सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हैं, पर साहब आए ही नहीं। बंटवारे का काम लटका हुआ है।”
रिंकू बघेल, ग्राम दाबनी ने कहा—“कब्जा हटाने का आवेदन देना है, एसडीएम ने मार्क भी कर दिया, पर नायब तहसीलदार की गैरहाजिरी से फंसा पड़ा है।”
नगर परिषद इंजीनियर राजीव राव ने कहा—“पीएम आवास योजना की सूची का अनुमोदन कराने आए थे, साहब की कुर्सी खाली है, अब लौटना पड़ रहा है।”
जुली देवी, ग्राम अजनार ने दर्द बयां किया—“चिलचिलाती धूप में दूर से आई हूँ, लेकिन यहां साहब हैं ही नहीं। हमारा काम अधर में लटका है।”
प्रशासन पर उठ रहे सवाल
लोगों का कहना है कि तहसील कार्यालय जनता की सुविधा के लिए है, लेकिन यहां जनता को ही सबसे ज्यादा त्रासदी झेलनी पड़ रही है। अधिकारी का दफ्तर में न बैठना सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।

