कल्याणकारी संवैधानिक प्रावधानों को छीनने की सुनियोजित सरकारी साजिश
मूकनायक/नीरज कुमार/ शिमला संभाग प्रभारी: हिमाचल प्रदेश में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) की भर्ती एक बार फिर विवादों में है। क्लास-III, नॉन-गैजेटेड श्रेणी के इन पदों पर राज्य के आरक्षण रोस्टर के मुताबिक अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लिए 22 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है। लेकिन सरकार की बैकडोर भर्ती नीतियों — आउटसोर्स, पीटीए (पैरेंट टीचर एसोसिएशन) और कॉन्ट्रैक्ट नियुक्तियां ने इस संवैधानिक हक को खोखला बना दिया है।
909 पदों में एससी वर्ग को कितना मिलना चाहिए था?
निदेशालय शिक्षा द्वारा जारी की गई हालिया Tentative Seniority List के अनुसार, 909 TGT (Arts, Medical, Non-Medical) पदों में से अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के उम्मीदवारों की संख्या बेहद कम है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन 909 पदों पर केवल 57 SC उम्मीदवार ही शामिल किए गए हैं। जबकि संवैधानिक प्रावधान और 22% आरक्षण रोस्टर के अनुसार SC वर्ग को कम से कम 200 पद मिलने चाहिए थे।
909 टीजीटी पदों में हिमाचल प्रदेश आरक्षण रोस्टर के अनुसार एससी वर्ग के लिए 200 सीटें ( क्लास 3 व 4, 22%) गारंटीड हैं। इसके अलावा पुराने चयन आयोग रिकॉर्ड बताते हैं कि औसतन 9-12 प्रतिशत एससी उम्मीदवार सामान्य मेरिट में भी चयनित होते रहे हैं। यानी इन 909 पदों में लगभग 90 अतिरिक्त अवसर भी एससी वर्ग को मिलने चाहिए थे। इस हिसाब से, कुल 290 पदों तक एससी समुदाय का प्रतिनिधित्व होना चाहिए था। लेकिन आउटसोर्स और पीटीए जैसी बैकडोर भर्तियों में आरक्षण का पालन न होने से यह सारे अवसर छिन गये।
बैकडोर भर्तियों का खेल
शिक्षा विभाग ने लंबे समय तक आउटसोर्स और पीटीए आधार पर नियुक्तियां कीं, जिनमें संवैधानिक आरक्षण का पालन पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया। पीटीए नीति के तहत वर्षों तक स्कूल स्तर पर स्थानीय दबाव, प्रभावशाली लोगों और प्रबंध समितियों की मनमानी चलती रही। इससे दलित और अन्य आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों का भारी नुकसान हुआ। हाईकोर्ट ने एक समय पर आउटसोर्स भर्ती प्रक्रिया पर रोक भी लगाई थी, लेकिन वह केवल अस्थायी साबित हुई। सरकार ने बाद में वही प्रक्रिया पुनः आरंभ कर दी। नतीजा यह हुआ कि संविधान प्रदत्त आरक्षण सिर्फ काग़ज़ों और सरकारी रिपोर्टों तक सीमित रह गया, जबकि व्यवहार में आरक्षित सीटें सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से भर दी गईं।
सवालों के घेरे में सरकार (1) जब क्लास-III पदों पर 22% आरक्षण तय है, तो आउटसोर्स और पीटीए में इसका पालन क्यों नहीं हुआ? (2)क्या 909 पदों की भर्ती में एससी वर्ग को 57 की जगह वास्तविक 290+ अवसर नहीं मिलने चाहिए थे? (3 )क्या यह संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना और सामाजिक न्याय के साथ विश्वासघात नहीं है?
हिमाचल की टीजीटी भर्ती प्रक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या आरक्षण केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा?
एससी वर्ग को गारंटीड 200 सीटों के साथ अनाराक्षित पदों पर अतिरिक्त अवसर भी मिल सकते थे, लेकिन बैकडोर नीतियों ने इसे छीन लिया। अब वक्त आ गया है कि एससी वर्ग की युवा पीढ़ी आवाज बुलंद करे और सरकार से जवाब मांगे- आखिर उनके अधिकार कब तक छीने जाएंगे?

