मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मुहूर्त देखना एक पुरानी और सांस्कृतिक प्रथा है, जिसे कई लोग मुहूर्त को शुभ मानते हैं और इसे अपने कार्यों में सफलता और सकारात्मक ऊर्जा लाने का एक तरीका मानते हैं। वहीं, कुछ इसे केवल एक भ्रम या अंधविश्वास मानते हैं, जो लोगों के मन में डर पैदा करता है। इसलिए, यह व्यक्तिगत आस्था और विश्वास का विषय है कि आप मुहूर्त में विश्वास करते हैं या नहीं। मुहुर्त देखकर किए गये कार्यो की क्या गारंटी है कि वह सफल ही होगा, बल्कि मुहुर्त के चक्कर में समय की बर्बादी होती है। किसी भी कार्य को करने या उसे सफल बनाने के लिए मुहुर्त मायने नहीं रखता, बल्कि उस काम के प्रति इंसान के नजरिए पर निर्भर करता है कि उसकी काम करने की क्षमताओं पर कितना काम सफल या असफल होता है।
कई बार कड़ी मेहनत के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती, लेकिन यह सिर्फ मुहुर्त का अभाव हो, यह भी जरूरी नहीं। इंसान जब पैदा होता है, तब वह बिना मुहुर्त के पैदा होता है और उसकी मौत भी बिना मुहुर्त के हो जाती है और बारीस भी बिना मुहूर्त के हो जाती है। इसमें मुहुर्त का इन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता तो हमारे जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है, फिर भी कुछ लोग मुहूर्त को शुभ और कुछ लोग अंधविश्वास मानते हैं। कई लोग इस बात से डर जाते हैं कि बिना मुहुर्त से कहीं उनके साथ कोई बुरा न हो जाए और बहुत से लोग इस पर विश्वास भी करते हैं। यहां यह भी सच्चाई है कि वर्षों की गुलामी और अशिक्षा/कुशिक्षा के चलते यह पाखंड व अंधविश्वास भारत में कुछ ज़्यादा ही है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

