Thursday, February 26, 2026
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महाबोधि महाविहार का इतिहास

मूकनायक
छत्तीसगढ़

बौद्ध धर्म का एक अत्यंत पवित्र स्थल है l जहां भगवान गौतम बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति (बोधी) हुई थी।इस लिए इस स्थान का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व बहुत गहरा है l
छठी शताब्दी ईसा पूर्व यहीं पर गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान लगाकर ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बने उस स्थान को बाद में उनके अनुयाईयो ने पवित्र स्थल के रूप में मान्यता दी इस स्थल को बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ में से एक माना जाता है। यहां ध्यान लगाकर बुद्ध ने संसार के दुख का कारण और उसमे मुक्ति मार्ग जाना था जिसे हम चत्तयवानी आर्य सत्यवानी (चार आर्य सत्य) कहते हैं।
बोधिविहार का निर्माण सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) ने बोधगया की यात्रा की थी उन्होंने यहां और वज्रासन का निर्माण करवाया माना जाता है उन्होंने यहां पहले मंदिर या संरचना भी यही से बनवाई थी वर्तमान मंदिर की संरचना महाबोधि मंदिर की वास्तुकला पांचवी छठवीं शताब्दी ई की मानी जाती है यह एक शानदार गुप्तकालीन स्थापत्य का उदाहरण है जो बौद्ध और हिंदू वास्तुकला के मिश्रण से बना हैl मंदिर की ऊंचाई लगभग 55 मीटर है और यह पिरामिड जैसी आकृति से बना हुआ है बोधिवृक्ष मंदिर के पास वही स्थान है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था वही बोधि वृक्ष है वर्तमान वृक्ष मूल वृक्ष की कई पीढ़ियों बाद की संतान है जो श्रीलंका से लाकर फिर से लगाया गया था l
ब्रिटिश शासन काल में 1880 के दशक में सर अलेक्जेंदर कमिग़म और सर एडमिन अर्नाल्ड के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ l
अनागारिक धर्मपाल एक श्रीलंका बौद्ध ने भी इस स्थान को पुनः बौद्धओ को दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी l
सन 2002 में यूनेस्को ने महाबोधि मंदिर को विश्व धरोहर घोषित किया था यह विश्व के सबसे प्राचीन और अभी भी उपयोग में आने वाले बौद्ध मंदिरों में से एक है आज भी लाखों बौद्ध श्रद्धालु पूरे विश्व से दर्शन करने आते हैं यह सिर्फ बौद्धओ के लिए नहीं बल्कि ध्यान,शांति और आत्मज्ञान की तलाश करने वाले लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र है यहां एक ध्यान कक्ष रत्न चक्र और कई बौद्ध मूर्तियां है l

(इतिहास के पन्नों से)
अनिल साखरे

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