Thursday, February 26, 2026
HomeUncategorizedपाठशाला बनी मधुशालाशिक्षा से दुश्मनी और शराब दुकान से अधिक लगाव क्यों?उपविषय:...

पाठशाला बनी मधुशालाशिक्षा से दुश्मनी और शराब दुकान से अधिक लगाव क्यों?उपविषय: शिक्षा बनाम शराब समाज, सरकार और जनजीवन पर प्रभाव

मूकनायक/  महिपाल सिंह टंडन
जैजैपुर / छत्तीसगढ़

भूमिका
=====

        शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है, और शराब उसकी रीढ़ तोड़ने वाला हथियार।
आज हम एक ऐसी विडंबना के दौर से गुजर रहे हैं जहाँ सरकारें एक तरफ शिक्षित भारत के नारे लगाती हैं, वहीं दूसरी ओर गाँव-गाँव में विद्यालयों को या तो बंद किया जा रहा है या उन्हें दूसरे उपयोगों में बदला जा रहा है और साथ ही साथ शराब दुकानों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह केवल नीति नहीं, यह एक सोच है एक ऐसा फैसला जो देश के भविष्य को धुंध में धकेलता है। इस विषय को गहराई से समझने के लिए हमें विद्यालय और शराब दुकान के उद्देश्य, जनजीवन पर प्रभाव, सरकार के दृष्टिकोण, लाभ-हानि और समाज पर दीर्घकालिक असर का विश्लेषण करना आवश्यक है।

1. विद्यालय बनाम शराब दुकान बुनियादी तुलना
=================

:- विद्यालय – शराब दुकान
उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना, मुनाफा कमाना, व्यसन बेचना, लाभ। देश को शिक्षित, स्वावलंबी नागरिक देना सरकारी राजस्व, लेकिन सामाजिक हानि।

:- जन जीवन पर असर – बच्चों, युवाओं को उज्ज्वल भविष्य देना परिवारों में हिंसा, गरीबी, अपराध बढ़ाना

:- परिणाम सामाजिक प्रगति, वैज्ञानिक सोच मानसिक/शारीरिक पतन, घरेलू कलह।

विद्यालय व्यक्ति और समाज को उठाता है, शराब दुकान व्यक्ति और समाज को गिराती है।

2. सरकार को शिक्षा से दुश्मनी क्यों ? कम राजस्व, शिक्षा में निवेश लंबी प्रक्रिया है, लाभ देर से दिखते हैं और वो भी सामाजिक रूप में सरकार को इससे तुरंत पैसा नहीं मिलता।


प्रश्न पूछने वाले नागरिक नहीं चाहिए, शिक्षा से व्यक्ति में प्रश्न पूछने, तर्क करने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की शक्ति आती है। एक शिक्षित समाज, सत्ता से जवाब मांगता है। लेकिन शराब और अशिक्षा दृ जनता को दबा कर रखती है।

:- राजनीतिक समीकरण – अशिक्षित और नशे में डूबी जनता भावनाओं में बहती है, नीतियों पर सवाल नहीं करती। यह हर चुनाव में वोट बैंक की भूमिका निभाती है।

3. शराब दुकान क्यों सरकार की प्रिय है ?
===================

सीधा राजस्व हर साल शराब से हजारों करोड़ रुपये का टैक्स सरकार को मिलता है। इसे राजस्व का सरल स्रोत माना जाता है।

:- कंट्रोल का साधन शराब की लत नागरिकों को शासन के प्रति कम जागरूक बनाती है। सरकारें जानती हैं कि शराब में डूबी जनता सड़क पर नहीं उतरेगी।

:- शोषण का रास्ता खुला – शराबी नागरिक जब अपराध करता है, तो वही सरकार जेलों में भी कमाई करती है कोर्ट फीस, जुर्माना, जेल खर्च।

4. जनजीवन पर शराब और शिक्षा का प्रभाव।
==================

:- शिक्षा – बेरोजगारी के खिलाफ कवच, बेटियों को आत्मनिर्भरता ,अपराध और रूढ़ियों से मुक्ति वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक चेतना।

:- शराब – घरेलू हिंसा में वृद्धि,

महिलाएं और बच्चे पीड़ित, अपराध दर में इज़ाफा, बीमारियाँ, गरीबी और आत्महत्याएँ जहाँ पहले बच्चे पढ़ने जाया करते थे, अब वहाँ शराब की दुकान खुल गई है। स्कूल के मैदान अब शराबियों की बैठक बन चुके हैं। माँ बर्तन मांजती है, बाप शराब पीकर मारता है, बेटा चोरी करता है, और बेटी स्कूल जाना छोड़ देती है।

5. दीर्घकालिक सामाजिक नुकसान
==================

:- नई पीढ़ी को खो देना – एक पूरी पीढ़ी, जो शिक्षित होकर समाज का नेतृत्व कर सकती थी, शराब और अशिक्षा की दलदल में डूब रही है।
:- महिला सशक्तिकरण पर हमला – शराब का सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता, मानसिक उत्पीड़न।
:- अर्थव्यवस्था पर भार – शराब से कमाए गए टैक्स से कहीं ज़्यादा नुकसान बीमारियों, अपराधों और उत्पादकता में गिरावट से होता है।

6. समाधान और जन चेतना की आवश्यकता।
===================

शराब दुकानों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर आंदोलन ,शिक्षा को प्राथमिकता देने वाली नीतियों की माँग।

ः- जनता द्वारा सरकार से सवाल करना  – विद्यालय क्यों बंद ? शराब क्यों चालू ? वैकल्पिक राजस्व स्रोत खोजना जैसे पर्यटन, हरित ऊर्जा, टेक्नोलॉजी ,एक तरफ समाज रोशनी चाहता है, दूसरी तरफ सरकारें अंधेरे के दरवाज़े खोल रही हैं।

:- विद्यालय बंद और शराब चालू –

केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि देश के भविष्य पर सीधा प्रहार है। सरकार को यह समझना होगा कि राजस्व से ज्यादा जरूरी राष्ट्र निर्माण होता है। और राष्ट्र का निर्माण कक्षा में होता है, शराब की बोतल में नहीं।
:- सरकार को शिक्षा से दुश्मनी और शराब दुकान से अधिक लगाव क्यों ?
शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है, और शराब उसकी रीढ़ तोड़ने वाला हथियार। आज हम एक ऐसी विडंबना के दौर से गुजर रहे हैं जहाँ सरकारें एक तरफ शिक्षित भारत के नारे लगाती हैं, वहीं दूसरी ओर गाँव-गाँव में विद्यालयों को या तो बंद किया जा रहा है या उन्हें दूसरे उपयोगों में बदला जा रहा है कृ और साथ ही साथ शराब दुकानों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

:- यह केवल नीति नहीं, यह एक सोच है – एक ऐसा फैसला जो देश के भविष्य को धुंध में धकेलता है। इस विषय को गहराई से समझने के लिए हमें विद्यालय और शराब दुकान के उद्देश्य, जनजीवन पर प्रभाव, सरकार के दृष्टिकोण, लाभ-हानि और समाज पर दीर्घकालिक असर का विश्लेषण करना आवश्यक है।
राजनीतिक समीकरण

ः-  अशिक्षित और नशे में डूबी जनता भावनाओं में बहती है, नीतियों पर सवाल नहीं करती। यह हर चुनाव में वोट बैंक की भूमिका निभाती है।

:- समाधान और जन चेतना की आवश्यकता – शराब दुकानों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर आंदोलन ,शिक्षा को प्राथमिकता देने वाली नीतियों की माँग जनता द्वारा सरकार से सवाल करना।
विद्यालय क्यों बंद? शराब क्यों चालू?

वैकल्पिक राजस्व स्रोत खोजना जैसे पर्यटन, हरित ऊर्जा, टेक्नोलोजी,एक तरफ समाज रोशनी चाहता है, दूसरी तरफ सरकारें अंधेरे के दरवाज़े खोल रही हैं। विद्यालय बंद और शराब चालू केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि देश के भविष्य पर सीधा प्रहार है।

  सरकार को यह समझना होगा कि राजस्व से ज्यादा जरूरी राष्ट्र निर्माण होता है ,और राष्ट्र का निर्माण कक्षा में होता है, शराब की बोतल में नहीं। शिक्षा के मंदिर बंद, नशे के द्वार खुले! टूटा हुआ विद्यालय, बच्चों के चेहरे पर मायूसी ,बोर्ड पर लिखा, विद्यालय स्थगित, पीछे झाड़ियाँ उग रही हैं ,चमकदार शराब दुकान पर लिखा 24 घंटे खुला ,शराब पीकर झगड़ते लोग।

संदेश
===

– बंद हो रहे स्कूल , खुल रहे शराब के ठेके।

– सवाल पूछो सरकार से ,हमें शिक्षा दो, शराब नहीं!
ः- नारे –
======

शिक्षा दो, शराब नहीं  भविष्य बर्बाद करना सही नहीं!

कलम पकड़ाओ, बोतल नहीं नई पीढ़ी को डुबाओ नहीं!

विद्यालय क्यों बंद? सरकार जवाब दे!
शराब से बर्बादी, शिक्षा से आज़ादी!
शराब बेचना आसान है, स्कूल चलाना महान है!

विषय विद्यालय बंद, शराब दुकान चालू सरकार की प्राथमिकता पर सवाल।

शिक्षा वह शक्ति है जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। लेकिन आज का दृश्य विचलित कर देने वाला है सरकारें विद्यालयों को बंद कर रही हैं और शराब दुकानों को नई ऊर्जा के साथ खोल रही हैं। यह केवल नीति नहीं, यह मानसिकता का प्रतिबिंब है।
शिक्षा समाज को प्रगति की राह दिखाती है, वहीं शराब समाज को पतन की ओर ले जाती है। विद्यालय बंद होने से एक बच्चा डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक बनने से वंचित रह जाता है, लेकिन शराब दुकान खुलने से वह अपराधी, बीमार या आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाता है।

सरकार को शिक्षा में घाटा नजर आता है, क्योंकि उससे त्वरित लाभ नहीं होता। लेकिन शराब से सरकार को टैक्स मिलता है, इसीलिए उसकी प्राथमिकता बदल गई है अब बच्चों का भविष्य नहीं, ठेके का टर्नओवर मायने रखता है।

एक जिम्मेदार समाज को यह स्वीकार नहीं करना चाहिए। हमें आवाज उठानी होगी ।
विद्यालयों के ताले खोलो, शराब के ठेके बंद करो।

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments