
मूकनायक/सुरेश साखरे
रायपुर छत्तीसगढ़
पिछले दिनों पटवारी सुरेश मिश्रा ने आत्महत्या करके अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। गौरतलब है कि 25 जून को बिलासपुर के तोरवा थाने में पटवारी सुरेश मिश्रा और एक तहसीलदार के नाम FIR हुआ था। इन पर आरोप था कि भारतमाला मुआवजे में गड़बड़ी की गई हैं।
बहुत सारे लोग यह नहीं जानते हैं कि मुआवजे में गड़बड़ी क्या होती है? तो चलिए मैं संक्षिप्त में बताता हूं। गवर्नमेंट ने यह नियम बनाया है कि यदि भूमि का क्षेत्रफल 12 डिसमिल से कम होगा तो मुआवजा 50 लाख बनेगा। इससे ज्यादा होगा या मान लीजिए 100 डिसमिल यानी 1 एकड़ होगा तो मुआवजा 16 लाख बनेगा।(यह एक उदाहरण है) यह नियम क्यों बनाया गया? किसको फायदा देने के लिए बनाया गया। मुझे आज तक नहीं समझ में आया। इसी नियम का फायदा उठाने के लिए सत्ताधीस, जमीन दलाल, और उच्च अधिकारी सक्रिय हो जाते हैं। उन जगहों में जहां पर भू अर्जन होना है, मुआवजा बटना है। मुआवजा बांटने वाले अधिकारी जिन्हें भूअर्जन अधिकारी भी कहते हैं। वह एसडीएम होते हैं। मुआवजे के लिए वही जिम्मेदार होते हैं।
यहां पर सत्ताधीस, दलाल, भू माफिया और उच्च अधिकारी मिलकर मुआवजे का खेल खेलते हैं। जमीन को छोटे-छोटे टुकड़े में बांटने का खेल करते हैं। और पटवारी से काम करने के लिए कहा जाता है। कई बार धमकाया जाता है। पैसे का भी लालच दिया जाता है। आदेश भी लिख कर दिया जाता है। वहां पर पटवारी को काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह सोचकर कि जब उच्च अधिकारी लिखित आदेश दे रहे हैं तो उन्हें काम करना ही होगा। क्योंकि उसे वेतन इस बात की मिलती है कि वह उच्च अधिकारियों के आदेश का पालन करें।
लेकिन जब घोटाला पकड़ा जाता है तो मीडिया समेत उच्च अधिकारी पटवारी को ही टारगेट करते हैं। मीडिया के लिए आज तो पटवारी एक विलन है। पटवारी यदि सर काट कर भी रख दे तो मीडिया वाले कहेंगे कि यह सर कटा तो है लेकिन थोड़ा तिरछा कट गया है।
अभनपुर के जो पटवारी राजस्व निरीक्षक आज फरार हैं, घर से बेघर है, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। इनमें एक महिला पटवारी भी है। 3 महीना होने जा रहा है उनकी जिंदगी में क्या बीत रहा होगा। इसका अंदाजा लगाना कठिन है। अभनपुर में भी पटवारी ने उच्च अधिकारी के लिखित आदेश पर काम किया है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि EOW ने पटवारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दिया और वह लोग अंडरग्राउंड है आज। इसी क्षेत्र में पत्रकारों का भी बड़ा खौफ है. कुछ पत्रकार तो सिर्फ भारतमाला पर ही समाचार प्रकाशित करते हैं और पटवारियों, अधिकारियों को टारगेट करते हैं। एक जमीन व्यवसायी बताते हैं कि पत्रकार ने उनसे 8₹ लाख लिया है। फिर भी उसके खिलाफ वह छापने की धमकी देता है और पैसे का मांग करता है।
पटवारी से पैसे की मांग करना, ब्लैकमेलिंग करना, आज कुछ मीडिया वालों का मुख्य काम रह गया है। नहीं तो फिर वह आपके खिलाफ छापते रहेंगे। आपको बदनाम करते रहेंगे। पूरे छत्तीसगढ़ में भूमि अधिग्रहण हुआ है 10 साल पुराने केस भी खंगाले जा रहे हैं। कम से कम 1500 से ज्यादा पटवारियों के ऊपर कार्यवाही की तलवार लटकी है।
बिलासपुर के पटवारी सुरेश मिश्रा को बचाया जा सकता था। उन्होंने सुसाइड नोट पर लिखा है कि वह निर्दोष हैं। उन्हें फंसाया गया है। भूअर्जन में पटवारी उच्च अधिकारियों के आदेश का पालन से ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकता। क्योंकि उसके दस्तखत से पैसे जारी नहीं होते। उच्च अधिकारी ही इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। अक्सर ऐसे प्रकरणों में कार्यवाही केवल पटवारी पर होती है उच्च अधिकारी बच जाते हैं। इसीलिए उनका हौसला बुलंद रहता है। सुरेश मिश्रा पहले से ही सस्पेंड थे और तीन दिन बाद उनका रिटायरमेंट था। ऐसी स्थिति में वह निराश एवं अकेले पड़ गए। काश संघ उनको ढाढस बन्धाता, साथी उनका साथ देते तो वह आत्महत्या नहीं करते और अंत में वे बा इज्जत बरी हो जाते।
EOW की जांच प्रक्रिया ऐसी है कि वह पटवारी को एक अपराधी मानकर ही जांच करते हैं। उन्हें जांच के दौरान गिरफ्तार कर लिया जाता है। यदि यह प्रक्रिया बिना गिरफ्तार किये किया जाए और न्यायालय का निर्णय होने के बाद ही यदि दोषी पाया जाए तो गिरफ्तार किया जाए। तो शायद कोई पटवारी परेशान होकर फरार न होगा। न ही आत्महत्या की ओर अग्रसर होगा।
अंत में यही कहना चाहता हूं की हम मनन करें और सोचें कि आखिर इस मामले में क्या किया जा सकता है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मुआवजा प्रकरण से पटवारी को अलग कर दिया जाए। क्या ऐसा नहीं हो सकता 12 डिसमिल से कम भूमि में ज्यादा मुआवजा देने का नियम खत्म कर दिया जाए। यह प्रश्न फिर खड़ा होता है कि आखिर कम भूमि में ज्यादा मुआवजा देने का नियम किसे फायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया है? विचार करने की आवश्यकता है।

