
मूकनायक/कमलेश लवहात्रै
बिलासपुर छत्तीसगढ़
मान्यवर कांशीराम साहब का वाक्य अक्सर ज़हन में गूंजता है “इरादे नेक न हो तो बहाने हजार हैं, और इरादे अगर नेक हों तो रास्ते हजार हैं।”
यही बात आज पूरी तरह सच साबित हुई, जब फूले निःशुल्क पाठशाला को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ा और वो थी बारिश की।
कुछ महीने पहले जब हमने अपनी पाठशाला को पुराने स्थान से शिफ्ट कर जैतखाम, डॉ. आंबेडकर नगर लाया गया, तब रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था। नई जगह, नया माहौल और चुनौतियों की लंबी सूची।
सबसे पहले सवाल यही था — बच्चे बैठेंगे कहाँ?
फिर चिंता थी — पढ़ाई के लिए पर्याप्त रोशनी कैसे होगी?
और सबसे बड़ी चुनौती थी — बारिश के मौसम में कक्षाएं कैसे चलेंगी?
खैर पहली चुनौती को तो बच्चों ने खुद से पराजित कर दिया जब उन्होने बिना किसी संकोच के अपने-अपने घरों से चटाई लेकर आए और जमीन पर बैठकर पढ़ाई शुरू कर दी।
उन्हें आरामदायक गद्दे या कुर्सियाँ नहीं चाहिए थीं उन्हें चाहिए थी शिक्षा,
और शिक्षा के लिए वे किसी भी त्याग को छोटा समझते थे।
दूसरी चुनौती, रोशनी की, इस चुनौती को जैतखाम के आसपास के आस पास रहने वाले लोगों ने सुलझा दी। जब भी कक्षा लगती, वे लोग अपने घरों की बाहर की लाइटें जला देते ताकि बच्चों को पढ़ने के लिए उजाला मिल सके। वो उजाला सिर्फ बिजली का नहीं था, वो साझेदारी और संवेदनशीलता का प्रकाश था।
यहां तक तो सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन बारिश अब भी एक अनकही चिंता बनी हुई थी।
कई लोगों ने सलाह दी — “वापस पुराने स्थान पर चलो”, लेकिन जहाँ पहले बच्चों के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ हुआ था, वहाँ लौटना मंज़ूर नहीं था।
मैंने तय कर लिया था — जो भी होगा, देखा जाएगा।
और वह दिन आज आज गया , आज शाम बिलासपुर में बारिश शुरू हो गई।
कुछ बच्चों के फोन आए — “सर, आज क्लास लगेगी?”
मैंने बिना झिझक के कहा — “हाँ, लगेगी। आप जैतखाम पहुँचिए।”
उनकी आवाज़ में उत्साह था, भरोसा था — और यही भरोसा असली जीत थी।
बच्चे खुद को बारिश से बचाते हुए पढ़ाई के लिए निकले। यह देखकर जैतखाम के आसपास के लोग चकित रह गए। और तभी, हमारे ही एक विद्यार्थी कमल कोशले के परिवार ने वो किया जो शायद कोई बड़ी व्यवस्था भी न कर पाती — उन्होंने हमें अपना कमरा दे दिया।
अब वह कमरा एक कक्षा बन चुका था।
वहीं बच्चे बैठे, भीगती उम्मीदों को सुखाकर, किताबें खोलकर, सपनों की इमारत फिर से बनाना शुरू कर दी।
इस कहानी में कोई बड़ी इमारत नहीं, कोई सरकारी मदद नहीं, कोई नामी शिक्षक नहीं।
यह कहानी है बच्चों की जिजीविषा की, एक समुदाय की साझी जिम्मेदारी की, और एक विचार की — कि शिक्षा अधिकार नहीं, संघर्ष है।
जहाँ लोग यह कहते हैं कि कुछ नहीं हो सकता,
वहीं जैतखाम की गली में मान्यवर कांशीराम जी की आवाज़ आती है —
“अगर नीयत सच्ची हो, तो रास्ते हजार है।”
फूले निःशुल्क पाठशाला सिर्फ एक पाठशाला नहीं यह बच्चों के सपनों की जमीन है, जहाँ हर बूंद एक प्रेरणा है, और हर बच्चा एक मशाल।

