मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जन्म एक शुरुआत है और मृत्यु इसका अंत है । जन्म और मृत्यु के बीच जीवन की यह एक यात्रा है । जीवन-मरण की दिनचर्या में अधिकतर लोग अंधविश्वास व शुभ अशुभ के चक्र में फंसकर कड़ी मेहनत से कमाए हुए धन का अनावश्यक अपव्यय कर देते हैं, जो परिवार की बर्बादी के साथ साथ शांति व्यवस्था में भी बाधक है, जबकि मृत्यु एक दिन निश्चित है क्योंकि मृत्यु इस सृष्टि का नियम है । मृत्यु का नाम सुनते ही हर प्राणी भयभीत हो जाता है । अगर मृत्यु ना होती तो हमें जीवन जीने के महत्व का आभास भी ना होता।
जीवन-मरण का चक्र एक जटिल अवधारणा है जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस जीवनरुपी यात्रा का कैसे सदुपयोग करते हैं और इससे क्या सीखते हैं ? मृत्यु मनुष्य को सजग रहने और विवेकी बनने की प्रेरणा प्रदान करती है, परंतु सांसारिक भोग हमें मृत्यु के वास्तविक अर्थ को समझने में बाधा उत्पन्न करता है और हमारी विरासत भी हमें यही शिक्षा देती है कि मनुष्य के लिए संतुष्ट, तनावमुक्त व प्रसन्नचित रहकर अपने उज्जवल भविष्य व, सुखमय जीवन के लिए सत्कर्म करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए क्योंकि मृत्यु एक चेतावनी है, जो मनुष्य को भोग विलास और पाप के मार्ग पर बढ़ने से रोकती है और यही जीवन मरण का चक्र व सृष्टि की व्यवस्था है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

