Thursday, February 26, 2026
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कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।

मूकनायक

बिलासपुर

  अर्थात कबीर कहते हैं कि आप लोगों से मिलिए पर करिये अपने मन की ना किसी से दोस्ती इतनी रखें कि आपका अपना वजुद ही खो जाए ना किसी से शत्रुतापूर्ण व्यवहार कीजीए   जहां आपको आपके व्यवहार से किसी को ठेस पहुंचे।
          संत कबीर दास जी का जन्म काशी विश्वनाथ में हुआ था। वर्णव्यवस्था के अनुसार वे जुलाहे जाति में पैदा हुए। किंतु वे जुलाहे का काम करते -करते भी सत्संग में रमे रहना उनके स्वभाव में था!  उनका कहना' रमता जोगी बहता पानी ' चरितार्थ होता था! संसार में होते हुए भी सांसारिक मोह माया से परे थे। गरीब थे किन्तु हमेशा लीन रहते थे! उनकी पत्नी लोई गरीबी से तंग थी। वे हमेशा उनसे धनवान होने की शिकायत करती थी लेकिन दोनों के बीच आपसी तालमेल गजब का था। कबीर दास गृहस्थ जीवन में सहनशील थे। यह व्यवहार उनकी पत्नी को भाता था। इधर कबीर दास जी की प्रसिद्धी बढ़ने के कारण उनके शिष्यों की संख्या और उनके रास्ते पर चलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। जिससे बनारस के पंडे पुरोहित मन ही मन उनसे ईर्ष्या करने लगे। और उनको बदनाम करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। साजिश के तहत एक नगरवधु को उनके पास भेजा गया और उनको फंसाकर उनका विवाह उस स्त्री के साथ कराया गया जबकि कबीर दास पुर्व से ही विवाहित थे! कबीर दास जी ने उन्हें सहजता से उसे अपनी पत्नी स्वीकार कर‌ ली! यह कहते हुए जैसी प्रभु की इच्छा! वह नगरवधु कबीर दास जी को तरह तरह से रिझाने का प्रयास करती और उनको बदनाम करने का काम करती रही लेकिन उसने देखा कि कबीरदास हमेशा लीन रहते थे! आखिर में उस स्त्री का भी मन परिवर्तन हो गया! इसी को साध संगत कहते हैं। आप अच्छे की संगत करोगे तो वैसे ही हो जाओगे यदि बुरी संगत करोगे तो वैसे ही हो जाओगे। अंत में वह स्त्री भी साध्वी हो गई और सादा जीवन जीने लगी। यह कबीर दास जी की महिमा थी। वह स्त्री कबीर दास जी के पैरों में गिर गई माफी मांगी! कबीर दास जी ने उसे माफ किया और अपनी शिष्या बना लिया।
  कबीर दास जी सांसारिक जीवन में पाखंड अंधविश्वास के विरोधी थे। अपने चिरजीवनकाल में हिंदु और मुसलमान दोनों ही धर्म चरमपंथी होने के बाद भी दोनों ही धर्मों पर पर तीव्र कटाक्ष किया।

बकौल कबीरदास जी निर्गुण धारा के कवि थे! उनका दोहे हिंदु और मुस्लिम धर्म के लोगों को परेशान करते थे।
‘कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद ल‌ई बनाया। मुल्ला अंदर बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।।
पाहन पुजे हरि मिले तो मैं पुजु पहार। या से तो चाकी भली पीस खाय संसार।
डाॅ बाबासाहेब आंबेडकर के पिताजी रामजी सकपाल कबीर पंथी थे। इसलिए बाबासाहेब आंबेडकर पर भी कबीर दास जी की जीवनी का गहरा असर पड़ा।
आज भी कबीर साहब के दोहे प्रासंगिक हैं। उनकी जीवनी से हमें पाठ लेना चाहिए। संत कबीर दास जी की जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेषक – योगेश मानवटकर

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