Thursday, February 26, 2026
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सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक बदलावों के कारण बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार होना है एक गंभीर समस्या

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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वृद्धावस्था में सतांन की स्थिति पर गहनता से विचार करें तो पता चलता है कि माता-पिता के वृद्धावस्था तक पहुंचते-पहुंचते संतान अक्सर उनसे छुटकारा पा लेना चाहती है । वह मां-बाप को बोझ और अपने ऐशो आराम भरी की जिदंगी की सबसे बड़ी बाधा समझते हैं । ऐसे बच्चों को यह कतई अहसास नहीं होता कि वे उन्हीं मां-बाप की बदौलत ही इस ऐशो आराम की जिंदगी जीने के काबिल हुए हैं । यही मां-बाप बच्चों की बचपन की जरूरतों से लेकर करियर निर्माण और शादी विवाह की जिम्मेदारी वहन करते हुए अपनी जरूरतों को यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि बुढ़ापे का सहारा बच्चे ही तो हैं, जो उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन समय के साथ सारा गणित उलट हो जाता है । बेटे के विवाह के बाद तो माता-पिता की स्थिति और भी विचारणीय हो जाती है । अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर बहुएं घर के बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती । कभी-कभी धन-सम्पत्ति के बंटवारे में भी बड़े-बूढ़ों की उपेक्षा काफी अपमानजनक होती है । ऐसी स्थिति में आपसी मन-मुटाव और कलह इस सीमा तक बढ़ जाता है कि बेटे-बहुओं के साथ उनका रहना दुर्भर हो जाता है ।
बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार होने का सबसे बड़ा कारण यह भी है कि बहू-बेटों में तालमेल ना बैठ पाने की एक बड़ी वजह पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव भी है । पश्चिम का अंधानुकरण बड़े-बूढ़ों को रास नहीं आता और बहू-बेटों को बुजुर्गों का यह दखल नहीं सुहाता । संतान द्वारा उनके आदेश का अनुपालन ना होना, बुजुर्गों को अपमान प्रतीत होता है । अक्सर वृद्धावस्था आने के बाद तो व्यक्ति का दैनिक क्रम अव्यवस्थित हो जाता है और वह अपने को बेकार महसूस करता है । ऐसे में आज का युवा यह भूल जाता है कि वृद्धावस्था हमारे जीवन का आखिरी चरण है और इस स्थिति में सभी को पहुंचना है । बुजुर्गों के अनुभव हमारे लिए अमूल्य धरोहर हैं जिन्हें संजोकर रखना हमारा नैतिक कर्त्तव्य है । इनसे सीख लेकर हम कामयाबी हासिल कर सकते हैं । घर-परिवार के साथ सरकार का भी दायित्व है कि वह वृद्धाश्रम, वृद्धावस्था पेंशन और उनके पुनर्वास की योजनाएं आदि लागू कर बुजुर्गों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करे । समाज की धरोहर ये वृद्धजन अपने को असहाय उपेक्षित महसूस न करें, इसके लिए घर-परिवार, समाज व सरकार, सबका प्रयास और दायित्व बनता है।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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