Thursday, February 26, 2026
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मौन रहकर अत्याचार व अन्याय सहना एक अपराध है और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और न्याय के लिए लड़ना भी है एक नैतिक कर्तव्य

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मौन रहना एक साधना की तरह है, लेकिन सोच-समझकर बोलना भी एक कला है । किसी के साथ हमारा रिश्ता कैसा रहेगा, ये हमारे बात करने के तरीकों पर निर्भर करता है। सोचे-समझे बिना बोलेंगे तो रिश्ते बिगड़ सकते हैं। कभी-कभी कुछ परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं, जब रिश्तों के लिए मौन रहना ज्यादा बेहतर रहता है, परंतु मौन रहकर अन्याय सहना भी एक तरह का अपराध है क्योंकि जब तक आप अन्याय का विरोध नहीं करेंगे तो आप पर अपराध बढ़ते ही जाएंगे। एक व्यक्ति का अन्याय सहने से, अन्य दूसरे व्यक्तियों के भी हौसले बुलंद होते जाते हैं। मौन रहकर अत्याचार व अन्याय सहना एक अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि सभी को भारतीय संविधान में दिए गए समानता के अधिकार अनुसार अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और न्याय के लिए लड़ना एक नैतिक कर्तव्य है ।
वर्तमान में वंचित समाज सोया हुआ है, उनमें एकता नहीं है, आपसी फूट और कलह इनके पतन का कारण है। ऐसे हालात में वंचित समाज पर अत्याचार, बलात्कार, शोषण आदि की घटनाएं आम बात हो गई हैं । ऐसी विकट परिस्थितियों में यदि लोग उसको रोकने के लिए आगे नहीं बढ़ें, तो समाज में अत्याचार व अन्याय बढ़ता ही जाएगा और एक समय ऐसा आएगा कि कोई उससे बचा नहीं पाएगा। इसलिए अपनी एकता का परिचय देकर अत्याचार और अन्याय का विरोध करें क्योंकि दूसरों पर हो रहे अन्याय के विरूद्ध आवाज़ उठाना वास्तव में स्वयं को अन्याय से बचाने जैसा है। इसलिए हमें हर स्थिति में चुप नहीं रहना चाहिए। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और विरोध करना महत्वपूर्ण है। ऐसा करने से हम दूसरों की रक्षा कर सकते हैं और अन्याय को खत्म कर सकते हैं ।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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