मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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इस दुनिया में जो भी आया है, उसकी मृत्यु निश्चित है । इंसान जीता ऐसे हैं, जैसे कभी मरेगा ही नहीं और मर ऐसे जाता है जैसे कभी जिया ही ना हो । इस दुनिया में जिस इंसान ने अच्छे कर्म करे होते हैं, लोग उसकी वाहवाही करते हैं और जिन्होंने बुरे कर्म किये होते हैं, लोग उनके बारे में मरने के बाद भी बुरा भला कहते हैं कि अच्छा है चला गया, धरती पर बोझ था । जब इंसान जिंदा रहता है तो लोग उसकी हैसियत के हिसाब से उसके आगे पीछे घूमते हैं । हैसियत अच्छी है तो गलत व्यक्ति को भी अच्छा बताते हैं और हैसियत खराब हो तो अच्छा व्यक्ति भी बेकार हो जाता है लेकिन मृत्यु के बाद तो ज्यादातर व्यक्तियों को लोग अच्छा ही बताते हैं । सही बात है, जाने के बाद भी किसी की बुराई क्यों करें ? वहीं बिमारी से ग्रस्त अति बूढ़े व्यक्ति के बारे में उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं। उनमें से कुछ कहते हैं कि हम चाहते हैं कि उनको कष्टों से छुटकारा मिल जाए । इसीलिए हम ऐसी कामना करते हैं। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार वे खुद ही इस तरह के बूढे व्यक्ति से छुटकारा पाना चाहते हैं जिसकी सेवा में वे दिनरात लगे हुए हैं।
इसलिए मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे मंहगी वस्तु है, तो वह शायद ”डैथ बैड” ही है क्योंकि आप पैसा फैंककर किसी को भी अपनी गाड़ी का ड्राइवर रख सकते हैं, जितने मर्जी नौकर चाकर अपनी सेवा के लिए लगा सकते हैं लेकिन इस डैथ बैड पर आने के बाद कोई दिल से आपको प्यार करे, आपकी सेवा करे, ये सब आप पैसे से नहीं खरीद सकते । जिन्दगी को खूबसूरत बनाने के लिए हमें एक दूसरे से तालमेल करना ही होगा क्योंकि पैसा ही सब कुछ नहीं है, जिसके फलस्वरूप परिवार, दोस्त व रिस्तों में प्यार का इजहार करते हुए सुखमय जीवन के इस बेसकीमति खजाने को बर्बाद ना होने दें।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

