Thursday, February 26, 2026
Homeदेशकर्म जीवन और भविष्य दोनों को करता है प्रभावित, जबकि तृष्णा व्यक्ति...

कर्म जीवन और भविष्य दोनों को करता है प्रभावित, जबकि तृष्णा व्यक्ति को बनाती है असंतुष्ट और व्याकुल

मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍🏻✍🏻
मनुष्य के अच्छे कर्म वे हैं, जो दूसरों के लिए सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जिनमें दया, सहानुभूति, सेवा, सच्चाई, ईमानदारी, और प्रेम जैसे मूल्यों का पालन शामिल है । अच्छे कर्मों में दूसरों की मदद करना, त्याग, और समाज के लिए सकारात्मक योगदान करना शामिल है । जब हम किसी कार्य को निःस्वार्थ भाव से करते हैं, तो हमारे कर्म का परिणाम भी अच्छा होता है। इसके साथ ही, हमारी आत्मा में भी शांति और संतोष का अनुभव होता है। इस भावना से हम दूसरों की मदद करने का अवसर पाते हैं और दूसरों को भी अपने इस कर्म से प्रेरित करते हैं।
वहीं तृष्णा! एक तृष्णा होती है, जो पानी पीकर तृप्त होती है। एक तृष्णा होती है जो खाना खाकर तृप्त होती है। एक तृष्णा होती है जो ढेर सारा मान-सम्मान पाने से तृप्त होती है। मतलब तृष्णाओं का कोई अंत नहीं है। धन पाने की तृष्णा, वैभव पाने की तृष्णा और न जाने किन-किन चीजों की तृष्णा। इन तृष्णाओं की पूर्ति में सारा जीवन लगा हुआ है। एक दिन जीवन पूरा हो जाता है लेकिन तृष्णा पूरी नहीं होती। आशा­-तृष्णा ना मरे, मर­-मर जाए शरीर। यहां यह सच्चाई है कि मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है। पहले कुछ मिल जाये, इसलिए कर्म करता है, फिर बहुत कुछ मिल जाये, इसलिए कर्म करता है। इसके बाद सब कुछ मिल जाये, इसलिए कर्म करता है, लेकिन उसकी यह तृष्णा कभी ख़त्म नहीं होती। जहाँ ज्यादा तृष्णा है, वहाँ चिंता स्वभाविक है ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments