मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍🏻✍🏻
रिश्ता टूटना किसी भी व्यक्ति के जीवन में एक मुश्किल दौर होता है. । चाहे वो रोमांटिक रिश्ता हो, दोस्ती हो या परिवारिक संबंध हो । किसी भी रिश्ते के टूटने से दुःख तो होता ही है और इसके साथ साथ परिवार के सदस्य तनावग्रस्त भी रहते हैं । सब कुछ तोड़ देना बहुत ही आसान होता है। घर, खिलौने, रिश्ते, दोस्ती, भरोसा, सब कुछ एक झटके में तोड़ा जा सकता है ! सालों की मेहनत से बनी सब चीजें तोड़ने में कुछ मिनट लगते हैं। टूटी हुई चीजों की खाली जगह भरने में फिर से सालों की मेहनत लगती है। शायद सब कुछ पहले जितना ख़ूबसूरत बन भी नही पाए और अगर बन भी गया तो हर टूटी चीज़ मन पर जो हल्की सी खरोंच छोड़ जाती है, वो दुनिया की कोई भी खूबसूरती नहीं भर पाएगी। फिर हम जीवन भर उलझे रहेंगें, उन खाली जगहों को भरने के लिए जोड़-तोड़ के खेल में। रिश्तों के टूटने में विश्वासघात, झूठ, असमंजस, असंतुष्टि, अनुशासन की कमी, मानसिक और भावनात्मक विवाद जैसी कुरीतियों की अहम भूमिका होती है ।
इस संबंध रहीम जी का दोहा भी है कि “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।। टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय”॥ रहीम कहते हैं कि प्रेम का रिश्ता बहुत नाज़ुक होता है। इसे झटका देकर तोड़ना यानी ख़त्म करना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा (बंधन) एक बार टूट जाता है तो फिर इसे जोड़ना कठिन होता है और यदि जुड़ भी जाए तो टूटे हुए धागों (संबंधों) के बीच में गाँठ पड़ जाती है। इसलिए जब, जहाँ, जैसे, जितना, जो कुछ भी मिल रहा है, उसकी कद्र कीजिये। संभालिए, सहेजिये, समेट लीजिये, बिखरते, टूटते, उजड़ते, घरों को, दोस्ती को, प्रेम को, भरोसे को । बिना आखिरी कोशिश किये, ऐसे ही मत जाने दीजिए किसी को भी क्योंकि गए हुए लोग, रिश्ते, प्रेम, भरोसा लौट कर नहीं आते और अगर आ भी गए तो उनका वापस आना और सब पहले जैसा हो जाना एक सुंदर सपने से ज्यादा कुछ नहीं है।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

