मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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पवित्र हृदय से ही महान कार्य संपन्न हो सकते हैं । इसलिए यदि हमारे जीवन का लक्ष्य श्रेष्ठ है तो हमारे हृदय की भावनायें भी निर्मल होनी चाहिए। उच्च चरित्र को विकसित करने के लिए दृढ़ता, धैर्य की आवश्यकता होती है। इसमें सही काम को उस समय तक बार-बार करना शामिल है, जब तक कि यह आदत न बन जाए। पवित्रता पवित्र आदतों से पोषित होती है। अनुशासन और शिष्यत्व के बीच आध्यात्मिक और साथ ही व्युत्पत्ति संबंधी संबंध है। इसलिए हृदय की पवित्रता के बारे में पहली सिफारिश पवित्र आदतों के अनुशासन का अभ्यास करना है।
हृदय की बात’ का अर्थ है, अपने दिल की आवाज़ सुनना और उसका अनुसरण करना । हृदय कोमल भावनाओं का प्रतीक है । यह मस्तिष्क को विचारों के कोलाहल से दूर करता है और उसे आराम देता है । गलत मार्ग पर तेज गति से चलने की अपेक्षा धीरे-धीरे ही सही, परंतु उचित मार्ग पर आगे बढ़ते रहना ही हमें एक दिन हमारे लक्ष्य की ऊँचाइयों तक अवश्य पहुँचा देगा। उचित दिशा में गति ही जीवन की दशा भी बदल देती है, अन्यथा जीवन भर की दौड़ से भी शून्य ही हाथ लगने वाला है। इसलिए जो अच्छा लगे उसे ग्रहण करो, जो बुरा लगे, उसका त्याग कर दो… फिर चाहे वह विचार हो, कर्म हो या फिर मनुष्य ही क्यों ना हो…
लेखक
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

