मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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समाज में फैली कुरीतियों का मतलब बुरी रीति, कुप्रथा, समाज या व्यक्ति को हानि पहुंचाने वाली अनुचित रीति-रिवाजों से है । कुरीतियां समाज के लिए अहितकर और अकल्याणकारी होती हैं । इनके दुष्प्रभाव समाज में लगातार देखने को मिलते हैं जिसमें जातिप्रथा, अंधविश्वास, पाखण्ड, लिंग भेदभाव, दहेज प्रथा, मृत्यु भोज, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, छुआछूत, शराब और नशीली दवाओं का सेवन, घरेलू हिंसा, वृद्धों की उपेक्षा आदि शामिल हैं। हालांकि सरकार द्वारा सती प्रथा, बाल विवाह, अत्याचार, बलात्कार, भ्रुण हत्या व अन्य कुरीतियों के निवारण हेतु कड़े कदम उठाए जा रहे हैं, परंतु हमारी सब से भयानक कुरीति हिंदुओं की विवाह पद्धति है। इस प्रथा की आड़ में अनगिनत पाप, पाखण्ड, अपराध और अन्याय धर्म के नाम पर किये जा रहे हैं। दहेज प्रथा तो एक ऐसी कुरीति है जिसमें विवाह के समय वर पक्ष को वधू पक्ष से धन और संपत्ति की मांग की जाती है। यह प्रथा न केवल आर्थिक भार डालती है, बल्कि कई बार महिलाओं के शोषण और हत्या का कारण भी बनती है। विवाह का मूल उद्देश्य स्त्री पुरुष का परस्पर आत्म भावना का नैसर्गिक विनिमय है।
धर्म मानवता के मुंडेर पर प्रेम, शांति और सदभावना का जलता हुआ चिराग है जिसमें जातीय नफरत और छुआछूत की भरमार है । यह अहिंसा का अनुष्ठान और आत्म कल्याण का दिव्य मार्ग है, जबकि धर्म ही प्राणी मात्र के लिए शरण है, गति है, प्रतिष्ठा है। बुढ़ापा आए, बीमारियां सताए, इन्द्रियां दुर्बल हो जाए, उससे पहले श्रद्धा सहित ऐसे धर्म का आचरण कर लेना चाहिए जिसमें प्रेम, प्रार्थना, परोपकार, समानता, प्रसन्नता और पवित्रता को धर्म मानते हुए हमें इन्हें अपने जीवन के साथ वैसे ही जोड़ लेना चाहिए, जैसे सूरज के साथ उसकी रोशनी जुड़ी हुई रहती हैं । आज धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला है और भोली भाली जनता अपनी गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया उसी पाखंड पर स्वाहा कर देती है । धार्मिक कुरीतियों को रोकने के लिए सरकार द्वारा कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। वहीं शिक्षा भी एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में आंतरिक रूप से परिवर्तन लाया जा सकता है जो कि स्थाई होता है ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

