मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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इंसान की सबसे बड़ी लालसा उसकी खुशी और सुख की इच्छा होती है। वह हर पल सुख, समृद्धि, सफलता और प्रसन्नता की तलाश में रहता है। लोग सामाजिक स्थान, पैसा, संबंध या यश जैसी चीजों के लिए तरसते हैं, जो उन्हें अपने आप को महसूस कराने और सम्मानित महसूस कराने में मदद करती हैं। हालांकि, लालसा की इस इच्छा को संतुष्ट करने के लिए व्यक्ति को धैर्य, विवेक और उच्चतम मानवीय मूल्यों का पालन करने की आवश्यकता होती है। अधिकतम सुख और समृद्धि इसी मानवीय मूल्यों के आधार पर ही प्राप्त की जा सकती है। हर मनुष्य की लालसा अपने मन व बुद्धि के अनुसार होती है और सबकी लालसा अलग अलग है । किसी को धन की लालसा है, किसी को पुत्र की लालसा है, किसी को परमात्मा प्राप्ति की लालसा है, किसी को काम की लालसा है । इसी प्रकार जीवन की अपनी अपनी लालसा है और जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल कर पाने की अतिरिक्त लालसा ही महत्वाकांक्षी हैं ।
कभी कभी समय के परिवर्तन से मित्र भी शत्रु बन जाते हैं और शत्रु भी मित्र क्योंकि स्वार्थ बहुत बलवान है । देखा जाए तो हर आदमी अपनी जिन्दगी में हीरो है, बस कुछ लोगों की फिल्म रिलीज नहीं होती । इसका मुख्य कारण लोगों के जीवन की सारी दौड़ धूप, अतिरिक्त पैसा, अतिरिक्त पहचान, अतिरिक्त शौहरत, अतिरिक्त प्रतिष्ठा पाना है। यदि यह अतिरिक्त पाने की लालसा ना हो तो जीवन एकदम सरल है !! अतिरिक्त पाने की लालसाएं आमतौर पर बहुत लंबे समय तक नहीं रहतीं, इसलिए जब तक वे समाप्त न हो जाएं, तब तक खुद को व्यायाम , समाजसेवा और मित्रों आदि के साथ व्यस्त रहना बहुत मददगार हो सकता है। बाकी ईश्वर न बदल सका आदमी को आज तक भी, और आदमी ने सैकड़ों ईश्वर बदल डाले ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

