मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज के बदलते परिवेश में सामाजिक तौर पर हम एक नहीं हैं क्योंकि न सिर्फ यह समाज बंटता हुआ दिखाई दे रहा है, बल्कि आज हम आपस में एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की स्थिति में भी नहीं है। ऐसी स्थिति में जब समाज टूटता बंटता है तो हर व्यक्ति भी किसी ना किसी रूप में उसकी चपेट में आता ही है। यह सब आए दिन की दर्दनाक घटनाओं से स्वत: जाहिर हो रहा है। मनुष्य के जीवन में शिक्षा और संगठन का बड़ा महत्व है। अकेला मनुष्य शक्तिहीन है, जबकि शिक्षित व संगठित होने पर उसमें शक्ति आ जाती है। शिक्षा व संगठन की शक्ति से मनुष्य बड़े-बड़े कार्य भी आसानी से कर सकता है। संगठन में ही मनुष्य की सभी समस्याओं का हल है। जो परिवार और समाज संगठित होता है वहां हमेशा खुशियां और शांति बनी रहती है और ऐसा देश तरक्की के नित नए सोपान तय करता है। इसके विपरीत जो परिवार और समाज असंगठित होता है, वहां आए दिन किसी न किसी बात पर कलह होता रहता है जिससे वहां हमेशा अशांति का माहौल बना रहता है। संगठित परिवार, समाज और देश का कोई भी दुश्मन कुछ नहीं बिगाड़ सकता, जबकि असंगठित होने पर दुश्मन जब चाहे आप पर हावी हो सकता है।
टकराव और बिखराव हर समाज अथवा परिवार में होता है लेकिन बहुतायत अनुसूचित जातियों में देखा गया कि जो भी व्यक्ति सफलता की सीढ़ी चढ़ता है, वह सबसे पहले अपने परिवार को बर्बाद करता है। माँ-बाप या भाईयों से सम्बंध खराब करेगा। कोई न मिले तो पति-पत्नी में ही दीवार खड़ी करते हैं। कभी कभी शराब, अय्याशी और झगड़े जैसे गैर जरूरी चीजों में उलझ जाते हैं। इससे कोई बच गया तो वह पड़ोसी या रिश्तेदारों में उलझ जायेगा। यहां यह विडंबना का विषय है कि भारतीय संविधान में वर्णित समानता के अधिकार और संवेदना के सारे स्तरों के मौजूद रहने के बावजूद सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, उत्पीड़न और समाज को विभाजित करने की कोशिश बंद क्यों नहीं हो रही ? हर किसी के बराबरी का भाव क्यों नहीं आता ? यह सब समाज व राष्ट्र के हित में नहीं है और समाज व राष्ट्र के हित के लिए आज नहीं तो कल हम सबको एकजुटता का परिचय देना ही होगा ।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

