मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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दहेज प्रथा हमारे समाज में महामारी की तरह है जो आत्मनिर्भरता और समृद्धि के मार्ग में एक बड़ी रूकावट बन गई है । दहेज लेना और देना दोनों ही सामाजिक अपराध हैं और मानव मात्र के लिए अशांति का कारण है । हर बेटी की यही मंशा होती है कि उसको एक अच्छा परिवार मिले, जो उसकी हर जरूरत को पूरी कर सके और उसे वैसा ही प्यार सम्मान अपने ससुराल में मिले, लेकिन यह दुख का विषय है कि अधिकतर घरों में ऐसा नही होता है, शादी में बड़ी डिमांड करके ससुराल वाले अपने घर में भी और लड़की के घर मे भी अशांति व चिंता का माहौल पैदा कर देते हैं, जिसके कारण कई लोगों को आत्म हत्या करनी पड़ती है, कई परिवारों का, कई व्यक्तियों का जीवन नरक हो जाता है, कोर्ट कचहरियों में धक्के खा खाकर परिवार बर्बाद हो रहे हैं और इस कुरीति के चलते बहन बेटियां आत्महत्या कर रही हैं।
हालांकि भारत की संसद ने दहेज प्रथा को रोकने के लिए दहेज निषेध अधिनियम, 1961 पारित किया था । यह कानून 1 जुलाई, 1961 से लागू हुआ था जिसके तहत दहेज लेना और देना अपराध है। इसके लिए सख्त कानून बनाकर दोषियों के लिए सजा का प्रावधान करना जनहित में है। दहेज प्रथा को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी और 498ए का भी इस्तेमाल किया जाता है परंतु यह विडंबना का विषय है कि इस समस्या की सामाजिक प्रकृति के कारण, यह कानून हमारे समाज में वांछित परिणाम देने में अब तक विफल रहा है। इसकी रोकथाम के लिए शिक्षा से समाज को जागरूक करना, दहेज लोभियों का बहिष्कार, दोषियों को दण्डित करने का प्रावधान करना व बेटियों को शिक्षित करके, उन्हें स्वतंत्र और जिम्मेवार बनाकर मजबूत करना व बेटियों के साथ बिना किसी भेदभाव के समानता का व्यवहार करना अनिवार्य है। दहेज प्रथा का अंत कोई एक व्यक्ति नहीं कर सकता, हम सभी संगठित होकर ही इस कुप्रथा का अंत कर सकते है और इस समाज सुधार की विशेष मुहिम में आप भी हिस्सा बनकर इस कुप्रथा का अंत करने में सहयोग देकर पुण्य के भागी बन सकते हो ।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

