मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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क्रोध समझदारी को घर से बाहर निकाल देता है और अंदर दरवाजे की चिटकनी लगा देता है। क्रोध का सबसे अच्छा इलाज चुप (मौन) है। क्रोधी व्यक्ति का मुख खुला रहता है किन्तु नेत्र बंद रहते हैं। क्रोध मूर्खता पर शुरू होता है और पश्चाताप पर खत्म होता है । सज्जन का क्रोध क्षण भर रहता है, साधारण आदमी का दो घंटे, मूर्ख आदमी का एक दिन व एक रात और महापापी का मरते दम तक रहता है ! क्रोध समुद्र की तरह बहरा है और आग की तरह उतावला हैं।
हम कीड़े मकोड़े और रेंगने वाले जन्तुओं को तो मार डालते हैं परन्तु अपने सीने में छिपे हुए क्रोध को नहीं मारते जो सचमुच में मारने की चीज है। जिस समय क्रोध उत्पन्न होने वाला हो उस समय उसके परिणामों पर विचार अवश्य करो। स्मरण रखिए कि आप क्रोध की दशा में ही अत्यंत निर्बल व क्षणीकाय रहते हैं। कारण यह है कि क्रोध का अस्त्र स्वयं चालक को घायल करता है। कुछ लोग कहते हैं कि जिस समय तुम्हें क्रोध आयें, उस समय एक गिलास भर के पानी पी लो। उफनता क्रोध शांत हो जाएगा या फिर आप उस स्थान को छोड़ दीजिए और चले जाइए । बलवान को जल्दी क्रोध नहीं आता, क्रोध तो मूर्खों को आता है, ज्ञानियों को नहीं। क्रोध एक तरह का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन ही कह सकते हैं।
लेखक
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

