मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
💎💎हमें इसे भलिभांति समझ लेना चाहिए. जहां तक मैं समझता हूं छुआछात हिन्दुओं की दिमागी बीमारी है. ये कोई ऐसा रोग नहीं जिस से मैं बीमार हूं. ये कोई गिलटी नहीं है. न यह कोई (पुराना) दर्द है अथवा कोई शारीरिक विकलांगता है जिसे दूर किया जा सकता है. बल्कि यह तो एक मानसिक ऐंठन (मरोड़) है. हरेक हिन्दू ये समझता है कि छुआछात करना ठीक है. मैं नहीं समझता कि मेरे मित्र (गृहमंत्री) हज़ारों वर्षों से पड़ी इस मानसिक-ऐंठन को कैसे खोला जा सकता है, जब तक उन सभी को किसी प्रकार के दिमागी- हस्पताल (पागलखाने) न भेजा जाए. इसलिए हमें समझना चाहिए कि हम कैसी बातें करते हैं और हम क्या कर रहे हैं. सभी को ये जान लेना चाहिए कि छुआछात का आधार (हिन्दू) धर्म है. इसमें कोई सन्देह नहीं है. हमें ये स्वीकारने में कि छुआछात का आधार धर्म है कोई शर्म नहीं महसूस करनी चाहिए. मनु ने अपनी पुस्तक मनु-स्मृति में निश्चित तौर पर छुआछात का आदेश दिया है. मनु ने कहा है कि अछूत गांव से बाहर निवास करें. उनके पास केवल मिट्टी के बर्तन होंगे. वह साफ-सुथरे वस्त्र नहीं पहनेंगे. वह मांग कर भोजन प्राप्त करेंगे आदि. हिन्दुओं को कैसे दोष दिया जा सकता है. हजारों वर्षों से उनके मनों में इस गंदे कानून की शिक्षा दी गई कि छुआछात करना पवित्र है. हिन्दू को यह सिखाया गया है कि अत्यंत नेक व सर्वोत्तम जीवन एक चूहे का है जो अपने ही बिल (सुराख) में रहता है, किसी से मेल-मिलाप नहीं रखता. इसे मत छूओ, उसे मत छूओ, उसे ये खाना चाहिए, ये नहीं खाना चाहिए. बिल में रहते हुए चूहा भी ऐसा ही जीवन गुजारता है. चूहा दूसरे चूहे को अपने बिल में नहीं आने देता-ऐसी है (समाजी) हालत. हम इतना तो कर ही सकते हैं कि छुआछात इतनी न बढ़- फैल जाए कि वह सार्वजनिक जीवन को प्रभावति करने लगे और लोगों की नागरिक-आज़ादियों पर भारी पड़ने लगे.
–बाबा साहब डॉ आंबेडकर
(6 सितम्बर 1954 को राज्यसभा में
भाषण का एक अंश)
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:- ए पी सिंह निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

