मूकनायक / राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज का आधुनिक समाज एक अत्यंत परेशान करने वाले विरोधाभास से जूझ रहा है—एक तरफ खाद्य बर्बादी का अंबार है, तो दूसरी तरफ भुखमरी से तड़पते करोड़ों लोग। यह स्थिति केवल एक आर्थिक या प्रबंधकीय विफलता नहीं है, बल्कि हमारे समाज के नैतिक पतन को भी दर्शाती है । वैश्विक स्तर पर हर साल टनों खाने योग्य भोजन शादियों, होटलों और घरों में कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाता है। इसके विपरीत, दुनिया की एक बड़ी आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें अक्सर चेतावनी देती हैं कि यदि केवल बर्बाद होने वाले भोजन का एक हिस्सा भी बचा लिया जाए, तो दुनिया से भुखमरी को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।
भोजन की यह बर्बादी नख केवल भूखे पेटों के साथ अन्याय है, बल्कि हमारे पर्यावरण के लिए भी एक बड़ा खतरा है। भोजन उत्पादन में लगने वाले पानी, जमीन और श्रम जैसे बहुमूल्य संसाधन भी इसके साथ बर्बाद हो जाते हैं। इस गंभीर संकट से निपटने के लिए हमें अपनी मानसिकता और आदतों को बदलना होगा। ‘थाली में उतना ही लें, जितना खा सकें’ के नियम को जीवन में उतारना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, बचे हुए भोजन को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए कम्युनिटी फूड बैंक और एनजीओ की मदद ली जानी चाहिए। जब तक हम भोजन का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक भुखमरी मुक्त समाज का सपना अधूरा ही रहेगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

