Saturday, July 25, 2026
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जंतर मंतर की खामोशी में शोर

जंतर मंतर की खामोशी में शोर है,
युवा खड़ा है, हाथ में डिग्री, आँख में जोर है।

कोई नारा लिखता है, कोई नारा बोलता है,
कोई कुर्सी से सच का हिसाब तोलता है।

कहते हैं अहिंसा से बैठे हैं, फिर भी डरते हो,
बैनर छीन लेते हो, धारा लगा देते हो।
ये कैसी तानाशाही है, कैसा ये न्याय है?
आवाज उठाओ तो कहते हो – ये अन्याय है?

शिक्षा बिकती है, पेपर बिकता है,
मेहनत वाले का सपना ही टिकता है।
बेरोजगार पूछे – मेरा हक कहाँ है?
जवाब मिले – अगली भर्ती में नाम कहाँ है?

सुनो, ये शोर दबेगा नहीं, ये रुकेगा नहीं,
ये लिखित में देगा, अब झुकेगा नहीं।
जंतर मंतर गवाह है, हर दौर का,
यहीं से टूटा है घमंड, हर जोर का।

लेखक
आशाराम मीणा
उप प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, कोटा।

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