मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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किसी भी घर की इमारत दीवारों से नहीं, बल्कि उस अदृश्य शक्ति से टिकी होती है जिसे हम ‘पत्नी’ कहते हैं। वह परिवार की वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द पूरे परिवार का मानसिक, भावनात्मक और व्यावहारिक जीवन घूमता है। सुबह की पहली चाय से लेकर रात को सबके सो जाने के बाद रसोई समेटने तक, एक पत्नी का दिन अनगिनत ऐसे कामों से भरा होता है, जिन्हें ‘काम’ की श्रेणी में भी नहीं गिना जाता। इस समर्पण की सबसे बड़ी खासियत इसका मौन होना है। वह बिना किसी वेतन, बिना किसी साप्ताहिक छुट्टी और बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के, पूरे घर को एक सूत्र में पिरोए रखती है। एक पुरुष भले ही घर का ‘कमाऊ सदस्य’ हो, लेकिन उस कमाई को एक खुशहाल जीवन में बदलने का हुनर पत्नी का ही होता है।
यहां यह गौर का विषय है कि यदि एक दिन के लिए भी पत्नी अपनी भूमिका से पीछे हट जाए, तो पूरा घर ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगता है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पति के तनाव को बांटना—यह सब उसके दैनिक जीवन का हिस्सा है। सीमित संसाधनों में भी सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन करना उसकी स्वाभाविक प्रतिभा है। अक्सर लोग जिसे ‘घरेलू काम’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, वह वास्तव में किसी भी समाज और परिवार की रीढ़ है। पत्नी का यह अनदेखा समर्पण केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि उसका निश्छल प्रेम है। आज ज़रूरत इस बात की है कि इस ‘अनदेखे समर्पण’ को ना केवल देखा जाए, बल्कि उसे वह सम्मान, आभार और सहयोग भी दिया जाए, जिसकी वह हकदार है क्योंकि एक सशक्त और सम्मानित पत्नी ही एक सुदृढ़ घर की नींव होती है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

