मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज के युग में शिक्षा को सफलता की एकमात्र कुंजी माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि यही कुंजी अब गरीबों की पहुँच से बाहर होती जा रही है। एक तरफ बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की थाली से दाल और सब्जियाँ कम कर दी हैं, तो दूसरी तरफ शिक्षा का व्यवसायीकरण एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हो गया है। जब दैनिक उपभोग की वस्तुओं—जैसे आटा, दाल, तेल और ईंधन—की कीमतें बढ़ती हैं, तो एक गरीब परिवार की आय का अधिकांश हिस्सा केवल पेट भरने में चला जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हाशिए पर चले जाते हैं। महंगाई के कारण एक अभिभावक के लिए यह चुनना मुश्किल हो जाता है कि वह शाम की रोटी का इंतजाम करे या बच्चे की स्कूल फीस भरे । निजी स्कूलों की भारी भरकम फीस, किताबों के ऊंचे दाम और कोचिंग संस्थानों का बढ़ता जाल शिक्षा को एक ‘उत्पाद’ बना चुका है। सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति और संसाधनों की कमी के कारण गरीब बच्चे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति तो और भी विकट है, प्रोफेशनल कोर्स की फीस लाखों में होने के कारण प्रतिभाशाली गरीब छात्र अपने सपनों का गला घोंटने पर मजबूर हैं।
वर्तमान में अमीर अपने संसाधनों से बेहतर शिक्षा ग्रहण कर लेता है, जिससे वह और अमीर बनता है, जबकि गरीब शिक्षा के अभाव में गरीबी के चक्र में ही फंसा रह जाता है। शिक्षा का खर्च न उठा पाने का मलाल गरीब माता-पिता को मानसिक अवसाद की ओर धकेलता है। इसके लिए सरकार को सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत करना होगा। केवल ‘मुफ्त शिक्षा’ काफी नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता ऐसी होनी चाहिए कि वह निजी संस्थानों को टक्कर दे सके। साथ ही, महंगाई पर नियंत्रण और छात्रवृत्तियों का प्रभावी वितरण ही वह रास्ता है जिससे हर गरीब बच्चा अपनी प्रतिभा के दम पर आसमान छू सके। शिक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा इससे वंचित रह गया, तो देश का सर्वांगीण विकास केवल एक कल्पना बनकर रह जाएगा।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

