Thursday, February 26, 2026
Homeभिंडपढ़ाई और इंसानियत के बीच खोया हुआ समाज

पढ़ाई और इंसानियत के बीच खोया हुआ समाज

समाज में शिक्षा को सफलता की सबसे बड़ी सीढ़ी माना जाता है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि अच्छे अंक लाओ, बड़ी डिग्री लो, ऊँचे पद पर पहुँचो—यही जीवन का लक्ष्य है। इसी दौड़ में लोग अपने जीवन का आधा हिस्सा किताबों, परीक्षाओं और प्रमाणपत्रों के पीछे लगा देते हैं। लेकिन एक गंभीर प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है इतनी पढ़ाई के बाद हम वास्तव में सीख क्या रहे हैं?आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान से अधिक प्रतिस्पर्धा बन गया है। स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक, हर जगह तुलना का माहौल है। कौन आगे है कौन पीछे इसी गणित में इंसान की संवेदनाएँ, करुणा और नैतिकता कहीं दब जाती हैं। पढ़ाई हमें आगे बढ़ने के तरीके तो सिखाती है, लेकिन अक्सर यह नहीं सिखाती कि किसी को साथ लेकर कैसे चला जाए। नतीजा यह होता है कि लोग सफल तो हो जाते हैं पर संवेदनहीन भी।हम देखते हैं कि शिक्षित कहलाने वाला व्यक्ति भी दूसरे को नीचा दिखाने में संकोच नहीं करता। भाषा में कटुता व्यवहार में अहंकार और सोच में श्रेष्ठता का भाव बढ़ता जा रहा है। डिग्रियों की ऊँचाई के साथ-साथ अहंकार भी ऊँचा होता चला जाता है। ऐसा लगता है मानो शिक्षा का असली पाठ यही रह गया हो दूसरों से बेहतर दिखना चाहे इसके लिए किसी को छोटा ही क्यों न करना पड़े। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि शिक्षा का मूल उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना था। शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी पाना नहीं बल्कि समझदार जिम्मेदार और मानवीय नागरिक बनना होना चाहिए। यदि पढ़ाई हमें सहानुभूति, समानता और सम्मान नहीं सिखा पाती, तो ऐसी शिक्षा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा की दिशा पर पुनर्विचार करें। पाठ्यक्रम में नैतिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं को उतना ही महत्व दिया जाए जितना अंकों और डिग्रियों को दिया जाता है। बच्चों को यह सिखाया जाए कि सफलता का अर्थ केवल दूसरों से आगे निकलना नहीं, बल्कि दूसरों के साथ आगे बढ़ना है। अंतत यह समझना होगा कि सच्ची पढ़ाई वही है जो इंसान को इंसान बनाए। वरना आधा जीवन पढ़ाई में गुज़ार कर भी अगर हम सिर्फ एक-दूसरे को नीचा दिखानाही सीख पाए तो यह हमारी शिक्षा व्यवस्था ही नहीं हमारी सोच की भी असफलता है।

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments