मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जय भीम का नारे की कहानी कैसे शुरू हुई थी और ये नारा किसने दिया था।
जय भीम का नारा देने वाले सबसे पहले अंबेडकर आंदोलन के एक कार्यकर्ता बाबूराम लक्ष्मण नागराले जी ने 6 जनवरी1935 में दिया था।
जय भीम के नारे में अपने आप में ही इतनी शक्ति है कि कि इसको बोलने वाला अपने आप को ही भय मुक्त कर लेता है। जब भी हम जय भीम का नारा सच्चे दिल से बोलते हैं। यही पहचान है एक सच्चे अंबेडकरवादी होने की।
अब हमारे जेहन में सवाल यह भी उठता है कि की जय भीम का नारा देना क्यों जरूरी था। यह नारा सभी को समानता और भाईचारे के बंधन में बांधने में सब की सहायता करें ताकि उनमें एकता बनी रहे।
जय भीम के नारे की बात करें तो बाबू हरदास जी के दिमाग में एक मुस्लिम समुदाय में को देखकर यह ख्याल आया था कि कि जब वह वालेकुम सलाम बोल सकते हैं तो हम जय भीम क्यों नहीं इसी वक्त उन्होंने सोच लिया था कि संबोधन के समय उन्हें किस नारे का अभिवादन करना है। यह ख्याल आते ही उन्होंने अपने पूरे समुदाय को बुलाया और उनसे बातचीत की कि जय भीम बोलकर एक दूसरे का अभिवादन करेंगे।
उन्होंने बोला कि मैं आप सबको जय भीम बोलूंगा तो प्रति उत्तर में आप सब एक दूसरे को बल भीम बोलेंगे।
बस यहीं से शुरुआत हुई जय भीम नारे की। जिसे आजकल हम सब अंबेडकरवादी मिलकर बड़े ही गर्व के साथ बोलते हैं।
जय भीम!
अब सवाल यह भी उठना है कि जब जय भीम के बदले में बाल भी बोला जाता था तो आज के वर्तमान समय में जय भीम के बदले में जय भीम ही क्यों बोला जाता है। फसल में शुरुआत में तो जब जय भीम का नारा दिया गया था तो उसे समय में जय भीम के अभिवादन में बल भीम ही बोला जाता था। पर जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे जय भीम के बदले में बाल भी नहीं जय भीम ही बोला जाने लगा और यह परिवर्तन हम सब ने मिलकर किया। और यह परिवर्तन इतनी शानदार तरीके से हुआ कि हम सबको एहसास ही नहीं हुआ की जय भीम के बदले में हम बोल भी नहीं बल्कि जय भीम ही बोलने लगेहैं। और यही वजह रही की जय भीम के बदले में बोला जाने वाला बल भीम धीरे-धीरे अपने आप ही गायब सा हो गया। और जिसका रिजल्ट यह निकाल कर आया कि बल भीम की जगह जय भीम ने ही अपना नाम बना लिया। उसे टाइम से लेकर आज तक जय भीम का नारा चल रहा है यही जय भीम का नारा हम सब अंबेडकर वादियों की पहचान है और साथ ही साथ बहुजन एकता की भी। यह बहुजन समाज को एक माला की तरह एक धागे में पिरोएं रखता है।
जय भीम जय संविधान नमो बुद्धाय।
जय भीम का नारा बाबू हरदास के द्वारा साल 1933-34 में समता सैनिक दल को नागपुर में दिया गया था। और इस तरह से हमारा जय भीम की शुरुआत हुई। जो आज हम सबके लिए बहुत ही गर्व की बात है।
जय भीम के नारे को हम इस तरह भी संबोधित कर सकते हैं कि यह हम सब की पहचान है। यह अंबेडकरवादी जय भीम का नारा एक नारा ही है यह बहुजन एकता का प्रतीक है यही वह नारा है जो हम सबको एकता में बांधे रखता है।
जय भीम का नारा हमारे लिए सिर्फ एक नारा ही नहीं है यह हमारे लिए एक आइडियल है एक इंस्पिरेशन है और एक जीने की कला है जो हमें यह सिखाता है कि हमें कभी भी जीवन में हार नहीं माननी चाहिए क्योंकि बाबा साहेब के हालात चाहे कितने भी बस से बत्तर हुए उन्होंने अपने जीवन में कभी भी हार नहीं मानी और वह हमेशा संघर्ष के पथ पर चलते रहे यदि वह संघर्ष के पद पर ना चलते तो आज हमें जय भीम का नारा नहीं मिलता यह हम यूं भी कह सकते हैं की जय भीम का नारा ही हमारे बाबा साहब और हमारी पहचान है बाबा साहब थे तो हम हैं जय भीम जय संविधान।
जय भीम के नारे की बात करें तो एक कवि ने अपनी कविता में भी इस नारे का प्रयोग किया है और इस कवि का नाम है कवि बिहारी लाल इन्होंने अपनी कविता में लिखा है कि
नवयुवक काम में जुट जावे
सब मिलकर काम करें परस्ती में
जय भीम का नारा लगा करें
भारत की बस्ती बस्ती में।
अगर हम बात हम बात करें तो जय भीम का नारा एक सामाजिक आंदोलन बन चुका है जो हमें न्याय दिलाता है और अत्याचारों के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है।
जय भीम का नारा इतना प्रेरणादायक या इतना शक्ति दायक बन चुका है कि आज लो आज लोग जय भीम का नारा सुनकर चौंक जाते हैं और हमें बहुत गर्व होता है कि हम सब इस नारे की पहचान है या यूं कहे कि इस जय भीम के नारे से ही हम सब की पहचान है।
दूसरे लोगों की तो क्या बात करें हम पर आज भी हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो जय भीम बोलने से कतराते हैं उन्हें लगता है कि हम जय भीम बोलने से हमें छोटी जाट का समझ जाएगा जबकि उन्हें यह नहीं पता है कि कि हम सब उसे महान हस्ती के वंशज हैं जिन्होंने पूरे देश को संविधान दिया है और सब के सब मिलकर उनकी छत्रछाया में रहते हैं
तो लिए मिलकरसब बोलते हैं
जय भीम जय भीम जय भीम।
जय भीम का नारा बोलने वाले किसी की भावना को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते हैं या किसी के खिलाफ नहीं जाना चाहते हैं जय भीम के नारे की लड़ाई हम सबके अस्तित्व की कहानी है और और अपने समाज को या सभी को अत्याचारों से मुक्त करने की कहानी है। यह अपने आप में ही एक अलग पहचान है जो सबको समानता का भाव देती है और साथ मिलकर चलती है। इसमें यह नहीं देखा जाता कि कौन अपना है और कौन पराया है सबको बस नए दिलाना है इस नारे का सम्मान है।
जय भीम जय संविधान नमो बुद्धाय
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लेखक: नीलम सोनीपत
सामाजिक चिंतक और पत्रकार चीफ ब्यूरो

