Thursday, February 26, 2026
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बाबा साहेब के आरक्षण से रिटायर्ड पीढ़ी ताश के पत्तों में है लीन

मूकनायक/ राजस्थान /अजमेर

कालू राम बैरवा

बाबा साहेब के आरक्षण की बदौलत इतिहास में पहली बार सरकारी पद के जरिए धन दौलत एवम सुख मिला।आरक्षण तो समाज का प्रतिनिधित्व है सेवा के दौरान व रिटायर होने के बाद समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होती है समाज का जो व्यक्ति गरीबी,अशिक्षा,अंधविश्वास के कारण पीछे छूट गया है उसे हाथ थाम कर आगे बढाना है।बुद्ध,गुरु रविदास,सन्त कबीर,ज्योतिबा फुले,अंबेडकर जैसे महापुरषों की विचारधारा को घर घर तक फैलाना है लेकिन यह क्या ! रिटायर्ड पीढी तो अपनी जड़ों से कट कर नींद,शराब,गप्पे,पूजा पाठ,तीर्थयात्रा और ताश खेलने मे मस्त है।जिन जातियों को हम रात दिन कोसते हैं उनके रिटायर्ड लोग सामाजिक,शैक्षणिक,आर्थिक व धार्मिक गतिविधियों में व्यस्त नजर आते हैं कोई धर्म को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं तो कोई आर्थिक खुशहाली के लिए अपने बेटे के बिजनेस में भागीदारी निभाते है तो कोई सामाजिक धार्मिक संस्थाओं में सक्रिय नजर आते है और इधर हम रिटायर्ड बहुजन लोग समाज को दिशा देने की बजाय घरों में बंद है,मौहल्ले की चौपाल या शहर की कालोनी में ताश खेलते नज़र आते हैं।उल्टा कुरीतियों व अंधविश्वास को बढावा देते है।गावों में तो कुछ रिटायर्ड पढ़ें लिखे निर्दयी लोग जातीय पंचरूपी जज बनकर गरीबों को दंडित कर जुल्म करने से भी बाज नहीं आते है।

बहुजन समाज के रिटायर्ड समाज के पास धन,दौलत,अनुभव व समय बहुत हैं लेकिन उन्हें समाज को देने के भाव नहीं हैं।धन का इतना अधिक मोह कि रिटायर होने के बाद भी उसी ऑफिस में हाथ जोड़कर वापस कॉन्ट्रेक्ट पर लग जाते हैं।बढिया पेंशन मिलती है,बेटे बेटियां भी ऊंचे पद पर है,शहर की अलग अलग कालोनी में मकान है किराया भी खूब आ रहा है।धन जोड़े जा रहे हैं लेकिन खर्च नहीं करते हैं।रिश्तेदारों व समाज की सामाजिक आर्थिक वैचारिक जागृति के लिए धन,समय व ज्ञान देने का मन नहीं करता है।सामाजिक क्षेत्र में काम करने की बजाय रिटायर होकर एमएलए,एमपी की ओर नजर रहती है भले ही सेवा के दौरान एक बार भी समाज के बीच नहीं बैठे हो।माफ करना में इसका एक ताजा उदाहरण देता हूँ एक रिटायर्ड जज साहब है जिनको जिंदगी में करना कुछ ओर था लेकिन कर कुछ ओर रहे है।जिनके ज्ञान और मार्गदर्शन से पूरा समाज लाभांवित हो सकता था।पूरा बहुजन समाज उनकी आवाज को ध्यान से सुनाता और उनकी एक एक बात को मानता क्यों कि न्याय कर्ता के अहोदे तक पहुँचने वाला कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता है ऐसे उन तमाम रिटायर्ड सज्जनो से माफ़ी चाहता हूं कि जो पारिवारिक जिम्मेदरी पूर्ण करनें बाद भी समाज को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहे है उनसे मेरा निवेदन है कि वे अपने कदम बहुजन समाज की ओर बढ़ाये।समाज को इनसे बहुत आशाएं थी लेकिन वह पूरी नहीं हो पायी जबकि एक सरकारी प्रतिनिधि के रूप में सुनहरा अवसर मिला था।उस समय सामाजिक कामों के लिए समय की कमी बताते थे।सरकारी नियमों से बंधे होने का रोना रोते रहते थे।साहित्य पढने के लिए समय नहीं होने का बहाना था लेकिन रिटायरमेंट के बाद कहते है कि आंखों की ज्योति कम हो गई हैं।घुटने जवाब दे रहे हैं।सच में इनका जीवन जा रहा है लेकिन समाज के काम नहीं आ रहा है खुद तक ही सीमित है।ऐसा भी नहीं है कि सभी ऑफिसर इसी प्रवृत्ति के होते हैं ऐसे माहौल में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो समाज की पीड़ा को महसूस कर अपना दायित्व पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं स्वयं को समाज के लिए झोंक रहे है और पे बैक टू दी सोसायटी के तहत अपने समय,धन व ज्ञान का दान कर रहे हैं।समाज उनका एहसान भी मानता है लेकिन बड़े बड़े ओहदों से रिटायर हुए स्वार्थी लोगों को कोई नमस्कार तक करने वाला भी नहीं है।मन से मान सम्मान तो बहुत दूर की बात है।बुद्ध बाबा साहेब,सन्त कबीर,गुरु रविदास,ज्योतिबा फुले,अंबेडकर,कांशीराम जी की विचारधारा का कारवां समाज की खुशहाली के लिए समर्पित,जुनूनी सामाजिक कार्यकर्ताओं,अधिकारी वर्ग,विचारकों,चिंतको,मेहनतकशों व दानदाताओं के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा हैं।यह हम सभी के लिए यह सुखद विषय हैं।

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