मूकनायक
राजस्थान /अजमेर
कालू राम बैरवा
जस्थान उच्च न्यायालय का विवादित फैसला”*यह फैसला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का अपमान कराने वाला साबित होगा।अब तथाकथित जातिवादी मानसिकता के लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को सरेआम अपमानित करेंगे तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग जातिवादी मानसिकता के लोगों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा भी दर्ज नहीं करवा पाएंगे क्योंकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को इरादतन अपमानित करने वाले जातिवादी मानसिकता के लोग अब माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय के इस फैसले से खुलकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का अपमान करेंगे।आपकी जानकारी के लिए कि माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार ने दिनांक 15.11.2024 को एक फैसले का निस्तारण करते हुए फैसला दिया है कि *भंगी, नीच, भिखारी और मंगती जैसे शब्द जाति सूचक नहीं हैं।* और इस आधार पर 04 आरोपियों को एससी-एसटी एक्ट के तहत लगे आरोपों से आरोप-मुक्त कर दिया है।दूसरी ओर माननीय न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार ने यह नहीं बताया कि फिर जातिगत शब्द कौनसे हैं जिन्हें जाति सूचक कहा जा सकता है?*अतः यह पूरी तरह से भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।*इस फैसले से जातिवादी मानसिकता के लोगों के हौंसले बुलंद होंगे और वो जातिवादी घटनाओं को और ज्यादा अंजाम देंगे।इस फैसले के माध्यम से माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय भी प्रमाणित तौर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अपमानित कर रहा है जो कतई बर्दाश्त करने लायक नहीं है।अतः इस फैसले का पुरजोर विरोध करना चाहिए तथा असंवैधानिक फैसला देने वाले माननीय न्यायाधीश के विरुद्ध संज्ञान लेना चाहिए।देशभर से इस फैसले के विरुद्ध और इस फैसले को निरस्त करने के लिए माननीया राष्ट्रपति को उचित माध्यम से ज्ञापन देने चाहिए।साथ ही यह अपील भी की जानी चाहिए कि जातिवादी मानसिकता के न्यायाधीशों को हटाकर उनके द्वारा दिए गए फैसलों की समीक्षा होनी चाहिए।आपका विदित होगा कि विगत कुछ वर्षों से एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण के विरुद्ध माननीय न्यायालयों से लगातार फैसले आ रहे हैं। उनके फैसले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारों को खत्म करने और वंचित करने के वाले आ रहे हैं।इसीलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को माननीय न्यायालयों के असंवैधानिक फैसलों के विरुद्ध 02 अप्रैल, 2018 और 21 अगस्त, 2024 को भारत बंद करना पड़ा था, इसीलिए अब समय आ गया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को खुलकर अपने अधिकारों को बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी, अन्यथा एक दिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरोधी मानसिकता के माननीय न्यायाधीश हमारे हक और अधिकारों को खत्म कर देंगे।केंद्रीय कानून मंत्री स्वयं आरक्षित वर्ग के है तो उनकी यह संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वो फैसले के विरुद्ध संज्ञान लेकर संविधान में प्रतिपादित अनुच्छेदों के मध्यनजर इस विरोधाभासी फैसले को निरस्त कराने की अविलम्ब पहल करें।जिंदा हों तो अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ों क्योंकि अब न्यायालय भी जातिवादियों के पक्ष में उतर गये हैं। यह लेखक के अपने विचार हैं।
लेखक: कालू राम बैरवा, सामाजिक चिंतक, वरिष्ठ पत्रकार, संभाग प्रभारी मूकनायक अजमेर राजस्थान
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