मूकनायक
ओमप्रकाश वर्मा
राजस्थान/अजमेर
गाँव, राज्य, देश, समाज और विश्व की रीढ़ प्राचीन समय से किसान को माना जाता रहा है। भारत (इंडिया) अपने आप में कृषि प्रधान कहा जाने वाला देश रहा है। देश के विकास को एक नूतन रूप देने हेतु किसान को ही सबसे अहम भूमिका में माना जाता है। जिस तरह एक पिता अपने पूरे परिवार का ख्याल रखता है, उसी तरह एक किसान पूरे देश का ख्याल करने के लिए अन्न उगाता है। अजीब-सी विडम्बना है विघ्ना की, लोग भी मुख्यतः २ वर्गों में विभक्त हो गए, एक कड़ी मेहनत कर रहा है और एक पंखे के नीचे आराम फरमा रहा है। ज़नाब पंखे वाले क्षीण प्रवृति वाले लोग होते हैं, जिन्हें अपने स्वंय से मतलब है। उनके लिए किसान या गरीब व्यक्ति एक अलग धर्म का हो जाता है,वो उसे नीचा समझते हैं लेकिन कम्बख्त भूल जाते है कि वो जिन्हें नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं वही उनका पालनहार है जो उन्हें अन्न दे रहा है। यदि हम बात करें एक किसान की तो भारतीय किसान को दो वक्त का खाना भी ठीक से नसीब नहीं हो पाता, एक किसान मेहनत करके फसल उगाता है उसकी फसल को खाने के लिए पूरा देश होता है लेकिन तब कोई उसका साथ नही देता जब वही किसान मेहनत से कम में फसल को बेचता है तब भी ये… ये जो बड़े लोग बैठे हैं ना ये ही कीमत तय करते हैं, साहिब। सच कहा जाये तो जो इंसान मुसीबत में किसी का साथ देता हो वो सबसे ज़्यादा मुर्ख होता है। किसान सरकार व देश के साथ उसकी हर सम्भव परिस्थिति में देश का साथ देता आया है। उदाहरणार्थ हाल ही में कालेधन को वापस मंगवाने के लिए नोटबन्दी जो चली थी, वैसे प्रधानमंत्री की मुहिम अच्छी थी, भारतीय भोले भाले किसानों ने सरकार की इस खतरनाक परिस्थिति में जिस तरह से मदद की वो वाक़ई सराहनीय है। किसान की ज़रूरत होती है कि उसका बेटा पढ़ लिख जाये जिससे कि वो भी एक भिन्न प्रकार के लोगों की श्रेणी में शामिल हो जाये, समय परिवर्तन के साथ-साथ समाज, देश के हालात सब बदल चुके हैं, एक लड़का सुबह ४:००बजे उठता है और लग जाता किताबों के पन्नो मे जॉब ढूंढने फिर उसके बाद निकल पड़ता है गाँव की सड़कों पर क्योंकि वो एक किसान का बेटा है उसे तुम्हारी तरह राजनीति को गन्दीनीति नहीं बनाना है। देश के लिए मर-मिटना, देश की सेवा करना ही उसे सिखाया जाता है। आज का यदि वक़्त देखा जाये तो किसान की मेहनत व्यर्थ सिध्द होती है, अपने बच्चे को शिक्षित बनाने के लिए एक किसान कर्ज़े में डूब कर मर जाता है एक उम्मीद “मेरा बच्चा कोई बड़ा आदमी बनेगा”, लेकिन उसका वो बच्चा जो वर्षों से गाँव की सड़कें तोड़ रहा होता है किताबों के पन्ने पलट रहा होता है बड़ा होकर फेसबुक या व्हाट्स एप के ग्रुप का एडमिन पद सम्भाल रहा होता है। भारतीय आर्थिक परम्परा में किसान अपनी मेहनत, कर्मठता से अपनी पहचान बरकरार रखता है। आज उसी किसान को तुम नज़रंदाज कर अपना जीवन सुरक्षित करने तथा भविष्य को उज्ज्वल बनाने में लगे हुए हो। किसान और उसके जीवन की ओर या उसके बारे में ना तो कोई सोचता है और न ही कोई ध्यान देता है। सरकार द्वारा भी किसान की स्थिति-परिस्थिति के सम्बन्ध में किसी की कोई सहयोगात्मक भूमिका नही निभाई जाती। वैसे किसान को प्राकृतिक विषमताओं के चलते कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, कभी अतिवृष्टि तो कभी अल्पवृष्टि और सूखे की स्थिति तो अब लगता है हमेशा के लिए ही आ गयी है। इनसे किसान को अपने परिवार की दैनिक आवश्यकताओं के उपार्जन में खासी मशक्कत करनी पड़ती है, वहीं सरकार उस स्थिति में भी किसान की सहायता करने की अपेक्षा उसके सिर महंगाई जैसे भीषण डाइनामाइट का प्रहार कर उसके आत्मघाती बनने में सहायक की भूमिका अदा करती है। यही कारण है कि आज देश के कोने-कोने से किसान की आत्महत्या करने सम्बन्धी सूचनाएँ/समाचार सुनने को मिलते हैं। वो आत्महत्या राजनीति वाले अपने विपक्षी दलों पर थोंपते हैं। समाज में पैसे की सबसे ज़्यादा इज़्ज़त है ये आज का वक़्त बताता है, साहिब।
लोगों कि जुबान कहती है किसान देश की नींव है कभी किसान की तरफ़ भी देखो तो प्यारे। क्या? आज नोट इतना बड़ा हो गया जो तुम उसकी समस्याओं को भूल गए अपने सम्बन्धियों को परेशान करने की बजाय तुम किसान के जेब कुरेद रहे हो क्या यह् ठीक है? ज़रा सोच कर देखो। वैसे तुम्हारी “प्राइवेट संस्था खोलकर किसान को शिक्षा देने लग जाओ वो भी पैसों में” मुहीम एक काम ये भी करेगी। बैंक वाले तुम्हारे आराम कर रहे हैं। ई-मित्र घूंस खा रहे है, ना जाने कैसी लिंक बना रखी हो जाने कहां तक हो किस सीट तक हो, कुछ इंसानियत बाकि रह गयी है… यदि है और जो निकलने को बेकाबू हो तो किसान की दुर्दशा पर ध्यान ज़रूर देना मित्र।
किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन❓
देश में किसानों की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। पिछले 20 वर्षों में लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है। यही कारण है कि आज जगह-जगह किसानों के उग्र आंदोलन छेड़े जा रहे हैं।
आखिर किसानों की दुर्दशा के कारण क्या हैं?
इसका मुख्य कारण हरित क्रांति और उससे जुड़ी नीतियों को माना जा सकता है। हरित क्रांति ने कृषि की दिशा को रासायनिक खाद, कीटनाशक, बड़े बांधों पर निर्भरता एवं अन्य सिंचाई परियोजनाओं की ओर मोड़ दिया। इन सब प्रयासों से बम्पर पैदावार होने लगी। यही कारण है कि इस काल को ‘‘हरित क्रांति’’ का नाम दिया गया। इस दौरान अनेक संकर बीजों की किस्में आने लगीं।
रासायनिक उर्वरक और संकर बीजों की सहायता से उगने वाली फसल में लगने वाले कीड़े कीटनाशक-प्रतिरोधी थे। इन्हें रोकने के लिए कीटनाशकों का अधिक प्रयोग होने लगा। उच्च क्षमता वाले कीटनाशकों के प्रयोग से पैदावार में एक तरह का जहर घुलने लगा। इसे छिड़कने वाले किसानों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ने लगा। कीटनाशकों के कारण किसान का खर्च बढ़ गया। दूसरी ओर, भूमि की उर्वरता में कमी आई। इन कीटनाशक में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी थी और ये मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं को भी खत्म करने लगे।
नहरों से सिंचाई के कारण जल-भराव की समस्या आने लगी। इसके कारण भूमि का कुछ भाग बेकार होने लगा। जहाँ नहरों से सिंचाई नहीं हो पाती थी, वहाँ भूमिगत ट्यूबवेल लगाने से जल स्तर कम होता गया।
बड़े-बड़े बांधों के निर्माण को भारत की कृषि के लिए वरदान बताया गया। इसी तर्ज पर गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना लाई गई। इस परियोजना में गुजरात के पिछले 50 वर्षों के सिंचाई बजट का 90 प्रतिशत खप गया और अब यह मात्र 2 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई कर पा रहा है। अनुमानित भूमि का यह महज 10 प्रतिशत सिंचित कर रहा है।
अगर वर्षा जल की हार्वेस्टिंग में इस परियोजना में लगाई गई राशि का आधा भाग भी खर्च किया जाता, तो गुजरात की कृषि भूमि के हर इंच की सिंचाई हो सकती थी।
वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और सूखे की समस्या बढ़ती जा रही है।
सरकार ने केवल चावल और गेहूं पर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित कर रखा है। अन्य फसलों पर यह निश्चित नहीं होता।
स्वामीनाथन समिति ने इसे सभी फसलों के लिए निश्चित किए जाने की सिफारिश की थी। साथ ही इसे किसानों की कुल औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक दिए जाने की बात कही थी। वर्तमान सरकार ने इसे लागू नहीं किया है। बल्कि मनरेगा एवं अन्य योजनाओं की निधि में भी कटौती कर दी है।ऋण संबंधी छूट की घोषणाओं के बाद भी पूर्ण रूप से यह नहीं दिया जाता। सूखे या बाढ़ की चपेट में आई फसलों का हर्जाना नहीं दिया जाता।
दरअसल, ऋण संबंधी छूट वगैरह से कोई स्थायी परिवर्तन नहीं होने वाला। पूरी कृषि नीति को ही बदलने की जरूरत है। हमें जैव खेती, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, माइक्रो जल सिंचाई, रासायनिक खाद के बजाय जैव-उर्वरक की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। इनसे कीटनाशकों की जरूरत कम हो जाएगी।भारत में आज भी 50 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। अगर हमने जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया, तो हम अन्न-संकट का सामना करेंगे।
हरीराम जाट
नसीराबाद,अजमेर (राज.)
94613-76979

