मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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ज्ञान के बिना कर्म अंधा है और कर्म के बिना ज्ञान अपंग (व्यर्थ) है, यह सूक्ति मानव जीवन के सबसे बड़े व्यावहारिक सत्य को उजागर करती है। किसी भी व्यक्ति की सफलता और चरित्र निर्माण में ज्ञान और कर्म दोनों की बराबर भागीदारी होती है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि मनुष्य के पास केवल ज्ञान हो और वह कर्म ना करे, तो ऐसा ज्ञान अपंग या व्यर्थ हो जाता है। बिना क्रियान्वयन के बड़े-बड़े विचार और योजनाएं केवल कागजों या दिमाग तक ही सीमित रह जाते हैं। जैसे, एक डॉक्टर दवाइयों का पूरा ज्ञान रखता हो, लेकिन मरीज का इलाज ही ना करे, तो उसका ज्ञान किसी काम का नहीं।
इसके विपरीत, बिना ज्ञान के किया गया कर्म अंधे के समान है। सही दिशा और सही समझ के बिना की गई मेहनत अक्सर गलत नतीजों की तरफ ले जाती है। मूर्खता में की गई ऊर्जा की बर्बादी व्यक्ति को केवल विनाश की ओर धकेलती है। जब जीवन में इन दोनों में से किसी एक का भी अभाव होता है, तो मनुष्य अपने मार्ग से भटक जाता है। ज्ञानहीन कर्म व्यक्ति को भटकाव और असफलता की ओर ले जाता है, वहीं कर्महीन ज्ञान उसे आलस्य और अहंकार के जाल में फंसा देता है । जीवन की सच्ची सार्थकता तभी है जब ज्ञान की रोशनी में कर्म किए जाएं। जब सही समझ और कड़ी मेहनत का मिलन होता है, तभी मनुष्य प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है और समाज के लिए प्रेरणा बनता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

