मूकनायक/रामलाल यादव, संपादक राजस्थान।
— बुद्ध से लेकर सद्गुरु कबीर, धनी धर्मदास संत रविदास पेरियार और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर तक असंख्य महापुरुषों का संघर्ष किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं था। उनका संघर्ष उस मानसिकता के विरुद्ध था, जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से ऊँचा-नीचा बनाती है।उन्होंने मनुष्य को रास्ता दिखाया—स्वाभिमान का।समानता का।स्वतंत्रता का।बंधुत्व का।और गरिमापूर्ण जीवन का।लेकिन आज भी हमें अपने समाज के सामने एक असहज और जरूरी सवाल रखना होगा—क्या सदियों पुरानी ऊँच-नीच की मानसिकता नए चेहरे, नए वेश, नए पंथ, नए कर्मकांड और नए धार्मिक आवरण में फिर से हमारे बीच जीवित तो नहीं रखी जा रही?भेदभाव हमेशा खुले रूप में दिखाई नहीं देता।कभी वह परंपरा बनकर आता है।कभी संस्कार बनकर।कभी धार्मिक पदवी बनकर।कभी कर्मकांड बनकर।और कभी श्रद्धा के नाम पर हमारे विवेक को शांत कर देता है।यही सबसे बड़ा खतरा है।इसलिए—महसूस कीजिए।जाँचिए।परखिए।सवाल कीजिए।और अपने जमीर से पूछिए—सत्य क्या है?श्रद्धा हो, लेकिन विवेक के साथश्रद्धा मनुष्य का अधिकार है।लेकिन श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि हम अपना विवेक किसी के हाथ सौंप दें।आज समाज में ऐसे धार्मिक कर्मकांड और सामाजिक व्यवहार भी दिखाई देते हैं, जहाँ कुछ लोग समाज की श्रद्धा, अन्न, आर्थिक सहयोग और सेवा तो स्वीकार करते हैं, लेकिन उसी समाज के लोगों के साथ समान व्यवहार करने से परहेज करते हैं।तो सवाल उठेगा ही—हमारा अन्न स्वीकार है—तो हमारा सम्मान क्यों नहीं?हमारा सहयोग स्वीकार है—तो हमारा पानी क्यों नहीं?हमारी सेवा स्वीकार है—तो हमारे साथ बराबरी का व्यवहार क्यों नहीं?हमारी श्रद्धा स्वीकार है—तो हमारा मनुष्य होना स्वीकार क्यों नहीं?यदि समाज का अन्न स्वीकार है,समाज का धन स्वीकार है,समाज की सेवा स्वीकार है,समाज की श्रद्धा स्वीकार है—लेकिन उसी समाज के मनुष्य की बराबरी स्वीकार नहीं—तो सवाल होगा ही—यह कैसी समानता?यह कैसी मानवता?और यह कैसा धर्म?अपने जमीर को जिंदा करोसबसे पहले दूसरों से नहीं, स्वयं से सवाल कीजिए।क्या हम केवल इसलिए किसी व्यक्ति को ऊँचा मान रहे हैं क्योंकि उसके नाम के आगे कोई धार्मिक पदवी लगी है?क्या हम केवल इसलिए किसी के सामने झुक रहे हैं क्योंकि समाज या किसी ग्रंथ-परंपरा ने उसे श्रेष्ठ बताया है?क्या हमने कभी उसके विचार और आचरण को परखा?क्या वह मनुष्य-मनुष्य की समानता स्वीकार करता है?क्या वह हमारे साथ बैठता है?क्या वह हमारे साथ भोजन करता है?क्या वह हमारे घर का पानी स्वीकार करता है?क्या वह हमें अपने समान मनुष्य मानता है?क्या वह हमें शिक्षा, आत्मज्ञान, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और वैज्ञानिक सोच की ओर ले जाता है?क्या वह हमें संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करता है?क्या वह समाज की जाजम से जुड़कर समाज के साथ खड़ा है?या वह हमें हमेशा श्रद्धा, निर्भरता, अंधानुकरण और कर्मकांड में ही बनाए रखना चाहता है?यही असली कसौटी है।यदि कोई व्यक्ति समाज की स्वतंत्र चेतना को दबाता है, समाज के भीतर सवाल उठाने वालों को बदनाम करता है, लोगों में फूट डालता है और अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने का प्रयास करता है, तो समाज को भावनाओं में बहने के बजाय उसके विचार और आचरण की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए।सवाल व्यक्ति से नहीं—भेदभाव की मानसिकता से हैहमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं है।किसी की जाति, वस्त्र, धार्मिक पहचान या पदवी उसे दूसरे मनुष्य से ऊपर नहीं बना सकती।सम्मान विचार का हो।सम्मान आचरण का हो।सम्मान मानवता का हो।यदि कोई स्वयं को “ऊँचा” और दूसरे मनुष्य को “नीचा” मानता है, तो यह केवल निजी सोच नहीं रह जाती। जब ऐसी सोच सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करती है, तब वह असमानता को मजबूत करती है।इसलिए—देखो।समझो।परखो।फिर स्वीकार करो।दान देना हमारी मानवता है।सहयोग करना हमारी उदारता है।श्रद्धा रखना हमारा अधिकार है।लेकिन—अपना अपमान स्वीकार करना हमारी मजबूरी नहीं है।बुद्ध, कबीर, रविदास और बाबा साहेब की कसौटीबाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक बराबरी और मानव गरिमा को मुक्ति का मूल आधार बनाया।कबीर ने पाखंड, अंधानुकरण और ऊँच-नीच पर सवाल उठाया।रविदास ने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा न माना जाए।बुद्ध ने करुणा, प्रज्ञा, विवेक और समता का मार्ग दिखाया।तो सवाल सीधा है—जिसे हम अपना मार्गदर्शक मानते हैं, क्या उसका विचार और आचरण इन महान मानवतावादी परंपराओं की समानतावादी चेतना के अनुरूप है ।क्या वो हमारे महापुरुषो का सम्मान करता है क्या वो अपने प्रवचन कर्मकाण्ड मे हमारे महापुरुषो को सम्मानित स्थान देता है । अगर जवाब होगा नही तो हमे सोचने की जरूरत है । हमे समझना होगा हमे एसी व्यवस्था का गुलाम बनाया जा रहा है जो समाज के उत्थान नही पतन की और जा रहा है सोचै जरा ?यदि नहीं—तो सवाल करो!सवाल करना अपराध नहीं।सवाल करना जागृति है।विवेक करना कमजोरी नहीं।विवेक करना स्वाभिमान है।सत्य को प्रमाण से परखना अधर्म नहीं।यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।भेदभाव को अस्वीकार करना विद्रोह नहीं।यह मानव गरिमा की रक्षा है।समाज की असली ताकत क्या है?हमारी ताकत केवल हमारी संख्या नहीं।हमारी असली ताकत है—शिक्षा।संगठन।जागरूकता।स्वाभिमान।स्वतंत्रता।वैज्ञानिक दृष्टिकोण।संवैधानिक चेतना।और आत्मबोध।जो समाज सवाल करना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे दूसरों के निर्णय पर निर्भर हो जाता है।और जो समाज अपने निर्णय का अधिकार दूसरों को सौंप देता है—उसकी स्वतंत्रता केवल कागज पर रह जाती है।इसलिए अपने बच्चों को केवल परंपरा मत सिखाइए।उन्हें सवाल करना सिखाइए।केवल पूजा मत सिखाइए।उन्हें मानवता सिखाइए।केवल श्रद्धा मत सिखाइए।उन्हें विवेक सिखाइए।केवल इतिहास मत सुनाइए।उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान दीजिए।जहाँ भेदभाव हो—वहाँ शांतिपूर्ण सवाल होजहाँ वास्तविक भेदभाव दिखाई दे, वहाँ समाज को हिंसा या नफरत का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए।तथ्य जुटाइए।सत्य की जाँच कीजिए।शांतिपूर्ण सवाल कीजिए।जवाब माँगिए।और आवश्यकता होने पर कानून तथा संवैधानिक संस्थाओं का सहारा लीजिए।पूछिए—आप हमें बराबर क्यों नहीं मानते?हमारे घर का पानी स्वीकार करने में आपको आपत्ति क्यों है?हमारा अन्न और सहयोग स्वीकार है, लेकिन हमारा सम्मान क्यों नहीं?हम मनुष्य हैं और आप भी मनुष्य हैं—फिर यह भेद क्यों?आप समाज को स्वतंत्र बनाने आए हैं या अपनी निर्भरता में बनाए रखने?इन सवालों का उत्तर—गाली से नहीं,तर्क से चाहिए।दुष्प्रचार से नहीं,प्रमाण से चाहिए।धमकी से नहीं,सत्य से चाहिए।सावधान! भेदभाव हमेशा पुराने चेहरे में नहीं आतासदियों पुरानी ऊँच-नीच की मानसिकता हमेशा अपने पुराने रूप में सामने नहीं आती।कभी वह जाति बनकर आती है।कभी धर्म बनकर।कभी पंथ बनकर।कभी कर्मकांड बनकर।कभी गुरु-परंपरा बनकर।कभी श्रेष्ठता के अहंकार बनकर।और कभी समाज के भीतर उन लोगों के विरुद्ध दुष्प्रचार बनकर, जो शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, आत्मबोध, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और समानता की बात करते हैं।इसलिए पूछिए—क्या यह समाज को जोड़ रहा है या बाँट रहा है?क्या यह समाज को स्वतंत्र कर रहा है या निर्भर?क्या यह ज्ञान दे रहा है या अंधानुकरण?क्या यह समानता सिखा रहा है या श्रेष्ठता?यही कसौटी होनी चाहिए।व्यक्ति को पहचान से नहीं, विचार और आचरण से परखिएसमाज को किसी व्यक्ति को उसकी जाति या धार्मिक पहचान के आधार पर खारिज नहीं करना है।व्यक्ति को उसके विचार और आचरण से परखना है।जो समानता सिखाए—उसकी बात सुनिए।जो स्वतंत्र सोच सिखाए—उसकी बात समझिए।जो शिक्षा दे—उसे आगे बढ़ाइए।जो संविधान और अधिकारों की चेतना दे—उससे सीखिए।लेकिन—जो आपको अपने से छोटा बताए, उससे सवाल कीजिए।जो अंधानुकरण सिखाए, उससे प्रमाण माँगिए।जो समाज में फूट डाले, उसकी भूमिका पर विचार कीजिए।जो आपके सहयोग पर निर्भर रहते हुए आपको ही नीचा बताए, वहाँ अपने स्वाभिमान को याद कीजिए।भीड़ नहीं—बुद्धि चाहिएहम किसी के खिलाफ भीड़ नहीं खड़ी करेंगे।किसी की जाति या पहचान के आधार पर बहिष्कार नहीं करेंगे।किसी के साथ अन्याय नहीं करेंगे।लेकिन—अपने साथ अन्याय को सामान्य भी नहीं मानेंगे।हमारा जवाब हिंसा नहीं होगा।हमारा जवाब होगा—ज्ञान।तर्क।संवाद।संगठन।कानून।संविधान।क्योंकि हमारे पास बाबा साहेब की महान देन है—भारतीय संविधान।संविधान हमारे हाथ में केवल किताब नहीं है।यह हमारे अधिकारों की चेतना है।भेदभाव बीमारी है।अंधानुकरण बीमारी है।हीनभावना बीमारी है।असमानता को सामान्य मान लेना बीमारी है।और इसका उपचार है—शिक्षा, विवेक, संगठन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक चेतना।अपने बच्चों को स्वाभिमान की भाषा सिखाइएअपने बच्चों से कहिए—जो तुम्हारे घर का अन्न खाता है, उसे तुम्हें नीचा समझने का अधिकार नहीं।जो तुम्हारे समाज के सहयोग से जीवन चलाता है, उससे बराबरी का व्यवहार माँगना तुम्हारा स्वाभिमान है।जो स्वयं को ऊँचा बताकर तुम्हें नीचा बनाए, उसके सामने अपना विवेक गिरवी मत रखो।लेकिन साथ ही यह भी सिखाइए—किसी से घृणा मत करो।किसी के साथ अन्याय मत करो।अपने साथ अन्याय भी मत होने दो।मुंहतोड़ जवाब हिंसा से नहीं—तर्क से दो।अपमान से नहीं—ज्ञान से दो।नफरत से नहीं—समानता से दो।अंधविश्वास से नहीं—वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दो।और गलत परंपरा को केवल इसलिए मत मानो कि वह पुरानी है।जानो। समझो। परखो। प्रमाण देखो। फिर स्वीकार करो।हमारी लड़ाई किसी धर्म से नहीं—असमानता से हैहमारा उद्देश्य किसी धर्म का अपमान करना नहीं है।हमारा उद्देश्य मनुष्य और मानवता का सम्मान है।हमारा उद्देश्य किसी पंथ से लड़ना नहीं है।हमारा उद्देश्य भेदभाव की मानसिकता से लड़ना है।हमारा उद्देश्य किसी को नीचे गिराना नहीं है।हमारा उद्देश्य किसी मनुष्य को नीचे गिरने से बचाना है।हमारा उद्देश्य नफरत फैलाना नहीं है।हमारा उद्देश्य समानता की चेतना जगाना है।कबीर का सहज मार्ग—बाहर नहीं, भीतर भी देखोसद्गुरु कबीर का संदेश केवल दूसरों की गलतियाँ खोजने के लिए नहीं है।वह हमें अपने भीतर झाँकने की चुनौती देता है।स्वयं को जानो।अपने विवेक को जगाओ।सत्य को पहचानो।अंधानुकरण से मुक्त होओ।और मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखो।इसलिए सवाल केवल यह नहीं—“दूसरा मुझे क्यों नीचा समझता है?”सवाल यह भी है—“क्या मैं स्वयं किसी दूसरे मनुष्य को नीचा समझने वाली मानसिकता तो नहीं पाल रहा?”यहीं से वास्तविक सामाजिक क्रांति शुरू होती है।कबीर की चेतना बाहर के आडंबर से अधिक भीतर की खोज पर जोर देती है।आत्मखोज से विवेक, विवेक से सत्य-बोध, सत्य-बोध से स्वाभिमान और स्वाभिमान से समानता की राह खुलती है।अंतिम संदेश — कबीर का सहज मार्ग अपनाएँजागो समाज!श्रद्धा रखो—लेकिन विवेक के साथ।सहयोग करो—लेकिन स्वाभिमान के साथ।धर्म और पंथ को मानो—लेकिन मानवता को सर्वोच्च रखो।परंपरा का सम्मान करो—लेकिन जो परंपरा मनुष्य को मनुष्य से नीचा बनाए, उसे तर्क और विवेक की कसौटी पर परखो।किसी व्यक्ति की बात केवल इसलिए मत मानो कि उसके नाम के आगे बड़ी ( पदवी ) लगी है या कही लीखा है।सवाल करो।तर्क करो।प्रमाण माँगो।सत्य खोजो।और फिर निर्णय करो।याद रखिए—जिस समाज ने अपने स्वाभिमान की कीमत पहचान ली, उसे कोई व्यवस्था लंबे समय तक नीचा नहीं रख सकती।लेकिन जो समाज सवाल करना छोड़ देता है, अंधानुकरण को अपना भाग्य मान लेता है और अपने विवेक की चाबी दूसरों को सौंप देता है—उसकी गुलामी केवल बाहर नहीं होती, उसके भीतर भी घर कर जाती है।इसलिए आज संकल्प लें—श्रद्धा रखेंगे—लेकिन विवेक के साथ।सहयोग करेंगे—लेकिन स्वाभिमान के साथ।धर्म मानेंगे—लेकिन मानवता को सर्वोच्च रखेंगे।सवाल करेंगे—लेकिन तर्क, सत्य और संविधान के रास्ते पर।भेदभाव पहचानेंगे—और उसका शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक विरोध करेंगे।
🔥 कबीर का संदेश — मानव मुक्ति का सहज मार्ग और अंत में एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझनी होगी—कबीर को केवल मानना पर्याप्त नहीं है; कबीर को जानना और उनके संदेश को जीवन में उतारना जरूरी है।कबीर का सहज मार्ग हमें किसी मनुष्य को जन्म से ऊँचा या नीचा मानना नहीं सिखाता।यह हमें पाखंड से बाहर निकलने, अपने भीतर झाँकने, सत्य की खोज करने, विवेक जगाने और मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।समानता चाहिए—तो कबीर को समझो।स्वाभिमान चाहिए—तो कबीर को समझो।पाखंड से मुक्ति चाहिए—तो कबीर को समझो।आत्मखोज चाहिए—तो कबीर को समझो और जानो।मानवता चाहिए—तो कबीर को समझो।विश्व बंधुत्व चाहिए—तो कबीर के मानवतावादी संदेश को जन-जन तक पहुँचाओ ।(नांद वंशी पंथ श्री हजुर आचार्य अर्धनाम साहेब के ) मानवता-केन्द्रित संदेश को भी इसी व्यापक चेतना से जोड़ते हुए हमें मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने, भेदभाव की दीवारें गिराने और विश्व एकता को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।हमारी मंजिल किसी व्यक्ति की पूजा नहीं—मनुष्य की गरिमा है।हमारी मंजिल किसी पाखंड की स्थापना नहीं—सत्य की खोज है।हमारी मंजिल किसी को नीचा दिखाना नहीं—हर मनुष्य को बराबरी का सम्मान दिलाना है।हमारी मंजिल केवल अपने समाज की मुक्ति नहीं—समूची मानवता की मुक्ति की चेतना जगाना है।आइए—कबीर को केवल मानें नहीं, कबीर को जानें।कबीर के सहज मार्ग को केवल सुनें नहीं, जीवन में उतारें।पाखंड से विवेक की ओर,अंधानुकरण से आत्मखोज की ओर,हीनभावना से स्वाभिमान की ओर,भेदभाव से समानता की ओर,और विभाजन से विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ें।यही सच्चा कबीर मार्ग है।यही मानवता की पुकार है।यही जागरण का संदेश है।“मनुष्य पहले—श्रेष्ठता बाद में।सत्य पहले—पाखंड बाद में।विवेक पहले—अंधानुकरण बाद में।मानवता पहले—भेदभाव का कोई स्थान नहीं।”
आइए हमारे साथ , सद्गुरु कबीर के सहज मानवतावादी मार्ग को जन-जन तक पहुँचाएँ और समानता, स्वाभिमान, आत्मबोध तथा विश्व बंधुत्व की चेतना को हम मिल कर मजबूत करें।साहेब बंदगी साहेब
संकलन संपादक एवं / महंत रामानंद साहेब झड़स, संपर्क: 8209466503

