मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा ✍️✍️
जीवन का यह एक शाश्वत नियम है कि बाहरी चुनौतियाँ केवल हमारे सामने खड़ी हो सकती हैं, लेकिन हमें हराना या जिताना पूरी तरह से हमारे भीतर के विचारों पर निर्भर करता है। कमजोर मानसिक स्थिति में व्यक्ति संकट को देखकर घबरा जाता है, खुद को ‘बेचारा’ मान लेता है और भाग्य को कोसने लगता है और वह बिना लड़े ही हार स्वीकार कर लेता है, जबकि मजबूत मानसिक स्थिति में व्यक्ति परिस्थिति को एक अवसर या चुनौती के रूप में देखता है। वह समस्या पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय उसके समाधान की तलाश करता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के सबसे सफल और महान लोगों ने बेहद विपरीत परिस्थितियों में जन्म लिया। यदि परिस्थितियाँ इंसान को कमजोर बनातीं तो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कभी वैज्ञानिक या राष्ट्रपति नहीं बन पाते और ना ही अब्राहम लिंकन, डॉ भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले जैसे तमाम अभावों में पले व्यक्ति इतिहास रच पाते। महापुरुषों की इन सफलताओं का राज उनकी मजबूत मानसिक स्थिति ही थी, जिसने उन्हें हर मुश्किल से लड़ना सिखाया। प्रसिद्ध कहावत भी है कि “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”, यदि हमारा मन अंदर से मजबूत है तो बड़ी से बड़ी विपत्ति भी एक रेत के टीले की तरह ढह जाती है। इसके विपरीत, यदि मानसिक स्थिति कमजोर हो, तो छोटी सी परेशानी भी पहाड़ जैसी महसूस होने लगती है। परिस्थितियाँ केवल हमारी परीक्षा लेती हैं, वे हमें नष्ट नहीं कर सकतीं। अंततः, परिस्थितियाँ बाहरी मौसम की तरह हैं, जो बदलती रहती हैं। हमें परिस्थितियों को बदलने की जिद करने के बजाय खुद को मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाना चाहिए कि कोई भी तूफान हमारे हौसलों को डगमगा ना सके। जब इंसान मानसिक रूप से दृढ़ होता है, तो परिस्थितियाँ उसके सामने घुटने टेक देती हैं, और वह एक विजेता बनकर उभरता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा।

