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पाथर पूजें हरि मिले,तो मैं पूजूं पहाड़…
युगद्रष्टा कबीर, परिवर्तनवादी कबीर, तर्क करने की सीख देने वाले कबीर, अनिश्र्वरवादी कबीर जिन्हों ने उस दौर की सामाजिक व्यवस्था के विरोध में जाकर समाज को परस्पर मैत्री, सद्भावना, सहिष्णुता का संदेश दिया। धर्म के नाम पर समाज में फैली अधर्म की प्रवृतियों को उजागर कर लोगों की आंखें खोली। समाज में फैल रहे अंधविश्वास व अधंभक्ति को नकारा, धर्म के नाम पर रोटियां सेंक रहे साधु, संतों, फकीरों, मुल्लाओं, मौलवियों, पादरियों व पुजारियों को सत्य का ज्ञान कराया। वर्तमान में सभी जात, पंथ, संप्रदायों में धर्म के नाम पर नजाने कितने कथित भगवान, स्वामी, पादरी, मौलवी, महंत, पूजारी, बाबा तमाम लोगों को गुमराह कर रहे हैं। धर्म, पंथ, मजहब, जाति के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से लड़ा रहे हैं। समाज में धर्म के नाम पर अशांति ही नही तो आर्थिक शोषण भी कर रहे है। अपने भक्तों को मोह-माया त्यागने की सीख देने वाले बाबा, मौलवी, पादरी स्वयं करोड़ों की संपत्ति खड़ी कर रहे हैं। त्रिकालदर्शी ज्ञान होने की बात करने वाले बाबा स्वयं संकटों में फंस रहे है। ईश्वर,अल्ला, गाॅड आपकी रक्षा करने का संदेश देने वाले बाबाओं को खुद जेड प्लस की सुरक्षा लग रही हो, तब पग-पग पर कबीर साहेब की याद आती है। जिन्हों ने दंभ, भक्ति अहंकार, गर्व पद व मद में पल रहे आदमी के संबंध में कहा है।
कबीरा गर्व न कीजिये,
काल गाहे केस।
ना जाने कित मारि के,
क्या घर क्या परदेस ।।
अपने समय के कबीर पहले कवी थे, जिनके काव्य में गरीबों, शोषितों, किसानों, दासों, दलितों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है। जनता का सबसे अधिक शोषण स्वर्ग-नर्क, परलोक और पुनर्जन्म के नाम से होता था। कबीर ने इन सबके खिलाफ अलख जगाई है। अंधश्रद्धा निमूर्लन, पांखड की पोल-खोल के दौरान मेरा स्वर्ग-नर्क व पूनर्जन्म जैसे विषय से सामना हुआ। इस के लिए मैने पुरोगामी विचारधारा के संतों को पढ़ा लेकिन कबीर ने जिस तरह स्वर्ग-नर्क और पुनर्जन्म का जो खंडन किया है वह तर्कशील मनुष्य को हिला देता है। कबीर कहते है कौन जन्म लिया है? और कौन मरा है, अगर कोई मर कर तुरंत दूसरा जन्म ले लेता है, तो फिर मरा कौन?, जब उसक पुनर्जन्म हो गया। और जब मरे हुए व्यक्ति का ही पुनर्जन्म होता है, तो मरा कौन, वह पहले ही जन्म ले चुका था। फिर दुसरा सवाल स्वर्ग और नर्क किस को मिला, क्यों कि जो मरा उसका तो पुनर्जन्म हो गया। अब या तो पुनर्जन्म झूठा या फिर स्वर्ग व नर्क झूठा है। दोनो चिजें एकसाथ नहीं हो सकती, क्यों कि स्वर्ग या नर्क में वही जाएगा जिसका पुनर्जन्म नहीं होगा। कबीर कहते है कि पांच भौतिक तत्वों से उत्पन्न शरीर मरने पर उन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाता है।
समाज में अंधश्रद्धा, पांखड फैलन का कारण अकसर शिक्षा अभाव माना जाता है। लेकिन कबीर जी ने कभी स्कूल का चौखट नहीं देखा। परंतु उनका ज्ञान, दोहा और चौपाई हमें जीवन जीने की नई राह देती है। पत्थरों में खुदा तलाशने वाले बुतपस्तों को भी कबीर ने ललकारा है।
पाथर पूजे हरि मिले
तो पूजूं मैं पहाड़।
ताते तो चक्की भली,
जाते पीस खाएं संसार।।
कबीर कागज की लेखी से ज्यादा ऑखन की देखी की बात करते थे। किताबों को ईश्वरीय बता कर आम जनों की चेतना का हरण कर उन्हें श्रद्धालु बना डालने वाले पुरोहित वर्ग के षडयंत्र के विरुद्ध कबीर का विद्रोह रहा है। कबीर वेद, कुरान, पुराण, धर्म, महजब, पंथ, और जाति वर्ण की कुल श्रेष्ठता के दंभी दावों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने अनुभवन जन्य अथार्थ से अवगत कराते रहे है। कबीर आग है, उससे बचा नहीं जा सकता, कबीर नग्न सत्य है, उस पर कोई लिपापोती नहीं हो सकती, जो है, सो है, यही तो कबीर है, यही तो फकीर है।
कबीर होने के लिए असली फकीर होना पड़ता है। परंतु अन्य संतों के अनुयायियों की तरह कबीर साहेब के अनुयायी स्वयं कबीर के मूल विचारों से दूर होकर ब्राम्हणवादी, पुरोहितशाही, श्रेष्ठतावाद के शिकार हो रहे है।
** एस.आर.शेंडे, सौंसर, छिंदवाड़ा

