मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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इंसान को सबसे अधिक ‘कंगाल’ अपनों का अभाव बनाता है। जब घर में बात करने वाला कोई ना हो, या संकट के समय कंधे पर हाथ रखने वाला कोई ‘अपना’ ना हो, तब करोड़ों की संपत्ति भी बेमानी लगने लगती है। अकेलापन एक ऐसी रिक्तता है, जिसे दुनिया की कोई भी महंगी वस्तु नहीं भर सकती। पैसे की कमी से भूख, आवास और सुविधाओं का अभाव हो सकता है। यह स्थिति कठिन जरूर है, लेकिन परिश्रम और अवसर से इसे बदला जा सकता है। एक निर्धन व्यक्ति भी समाज में अपने चरित्र और सिद्धांतों के बल पर सिर उठाकर जी सकता है परंतु, यदि जीवन से सम्मान चला जाए, तो इंसान भीतर से टूट जाता है। बिना सम्मान के वैभवपूर्ण जीवन भी एक ‘स्वर्ण पिंजरे’ के समान है, जहाँ सुख तो है परंतु गरिमा नहीं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पैसा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य है और इसकी कमी इंसान को ‘गरीब’ बनाती है, लेकिन क्या केवल पैसा ही संपन्नता की कसौटी है ?वास्तव में, मनुष्य की असली ताकत उसका आत्मसम्मान और उसके प्रियजन होते हैं। जो व्यक्ति अपनों के प्रेम और विश्वास से वंचित है, वह संसार का सबसे दरिद्र व्यक्ति है । पैसे की गरीबी को दूर करना फिर भी संभव है, लेकिन सम्मान और अपनों की कमी इंसान को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से दिवालिया बना देती है। भौतिक रूप से गरीब होना संघर्ष है, लेकिन भावनात्मक रूप से कंगाल होना जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है। “सच्चा अमीर वही है, जिसके पास संतोष का धन, स्वाभिमान की शक्ति और प्रेम करने वाले अपनों का साथ है।”
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

