Thursday, June 11, 2026
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दिखावा करना एक ऐसा महंगा शौक है, जो अंततः आपको अंदर से बना देता है खाली और बाहर से कर्जदार

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आधुनिक समाज में ‘दिखावा’ एक मानसिक महामारी बन चुका है। अपनी असली पहचान को स्वीकार करने के बजाय, लोग दूसरों की नजरों में ‘सफल’ और ‘सुखी’ दिखने की होड़ में अपनी वास्तविक खुशी, मानसिक शांति और आर्थिक नींव की बलि दे रहे हैं। दिखावे की सबसे पहली और सीधी मार व्यक्ति की जेब पर पड़ती है। लोग अपनी आय से अधिक खर्च करने के जाल में फँस जाते हैं। महंगे स्मार्टफोन, ब्रैंडेड कपड़े और लग्जरी गाड़ियाँ ईएमआई पर लेना अब स्टेटस सिंबल बन गया है। दिखावे के चक्कर में हम अपनी तुलना दूसरों से करना शुरू कर देते हैं । “पड़ोसी के पास बड़ी कार है, तो मुझे उससे भी बड़ी चाहिए।” यह सोच ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना पैदा करती है। इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स “लाइक” और “कमेंट” के ज़रिए दिखावे की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।
लोग अपना कीमती समय पैसा कमाने और फिर उसे दिखाने में लगा देते हैं, जबकि वह समय परिवार और खुद के विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। दिखावा उस नमक की तरह है, जो प्यास बुझाने के बजाय और बढ़ा देता है। हमें यह समझना होगा कि सादगी ही परम ऐश्वर्य है। असली सम्मान आपके चरित्र, व्यवहार और ज्ञान से मिलता है, ना कि आपकी महंगी घड़ी या कार से। “दिखावा करना एक महंगा शौक है, जो अंततः आपको अंदर से खाली और बाहर से कर्जदार बना देता है।” यदि हम अपनी वित्तीय सीमाओं का सम्मान करें, अपनी मानसिक शांति को प्राथमिकता दें और दूसरों की राय के बजाय अपनी खुशी के लिए जिएं, तभी हम एक संतुलित और सार्थक जीवन जी सकते हैं। असली ‘स्टेटस’ वह नहीं जो लोग देखें, बल्कि वह है जो आप स्वयं के बारे में महसूस करें।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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