1 मार्च 1931 को मुंबई के दामोदर हॉल में आयोजित वह ऐतिहासिक सभा केवल एक स्वागत समारोह नहीं थी, बल्कि सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान के उभरते आंदोलन की गूंज थी। इस दिन डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर मुंबई लौटे थे, और उनके सम्मान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया।
यह सभा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय डॉ. अंबेडकर वंचित और दलित समाज के राजनीतिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व और सामाजिक समानता के प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला चुके थे। वे ब्रिटिश शासन और भारतीय राजनीतिक नेतृत्व—दोनों के सामने यह स्पष्ट कर रहे थे कि बिना सामाजिक न्याय के स्वतंत्रता अधूरी है।
दामोदर हॉल में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि डॉ. अंबेडकर केवल एक विधिवेत्ता या बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि करोड़ों शोषितों की आशा और संघर्ष की आवाज़ बन चुके थे। यह सभा उनके नेतृत्व के प्रति समर्थन व्यक्त करने, उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने और संगठन को और अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी।
उस दौर में जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और राजनीतिक उपेक्षा अपने चरम पर थे। ऐसे समय में डॉ. अंबेडकर का प्रत्येक कदम दलितों और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित था। सभा में उनके विचारों ने लोगों में आत्मविश्वास जगाया—कि शिक्षा, संगठन और संघर्ष के माध्यम से परिवर्तन संभव है।
आज जब हम उस दिन को याद करते हैं, तो यह केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि उस संकल्प को दोहराना है कि समानता, प्रतिनिधित्व और मानव गरिमा के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। है।उस महामानव को कोटि कोटि नमन वंदन 🙏🙏🙏🌹🌹🌹
🌹🙏✍️ बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया भारतीय बौद्ध महासभा राजस्थान दक्षिण

