शामलात जमीन की सम्पन्न लोगों में बंदरबाट और गरीब वर्ग को हाशिये पर धकेलने का है मामला
डॉ. नीरज कुमार/शिमला:| हिमाचल प्रदेश में शामलात भूमि को लेकर जारी विवाद अब न्यायिक दायरे में और तेज़ हो गया है। 26 फरवरी को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में इस मामले पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 22 अप्रैल तक विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई है कि वर्ष 2001 में किए गए संशोधन के बाद हजारों गरीब, दलित और भूमिहीन परिवारों को उस भूमि से वंचित किया गया, जिस पर वे दशकों से काश्त कर रहे थे। उनका कहना है कि “कब्जेदार” की परिभाषा में किए गए बदलाव ने सामाजिक न्याय की मूल भावना को आहत किया है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार से नोटिस के माध्यम से यह स्पष्ट करने को कहा कि किन आधारों पर भूमि का स्वामित्व बदला गया, इस मुद्दे से वंचित कैसे प्रभावित हो रहे है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामला व्यापक जनहित से जुड़ा है, इसलिए सरकार को तथ्यों और कानूनी स्थिति का समुचित विवरण प्रस्तुत करना होगा।
उल्लेखनीय है कि यह विवाद हिमाचल प्रदेश टेनेंसी एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट, 1972 तथा ग्राम शामलात भूमि से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या से जुड़ा है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि संशोधन के कारण वास्तविक खेतीहर और परंपरागत उपयोगकर्ताओं को नुकसान हुआ है जबकि 1950 से पहले के भूपति और जमीदारों/जैलदारो को इससे फायदा पहुंचाया जा रहा है। अब निगाहें 22 अप्रैल पर टिकी हैं, जब राज्य सरकार अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखेगी। मामले के अंतिम निर्णय से प्रदेश के हजारों ग्रामीण परिवारों के भविष्य पर प्रभाव पड़ सकता है।
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