भारत रत्न डॉ भीमराव अम्बेडकर का मनमाड सम्मेलन
12फरवरी 1938 सम्मेलन मनमाड का वह दिन… सामने बैठे दलित वर्ग के रेलकर्मी, जिनकी ज़िंदगी संघर्ष, अपमान और असमानता से भरी थी। और मंच पर खड़े डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर — एक नेता नहीं, बल्कि एक जागृत चेतना की आवाज़।
मैं मानो उन्हें कहते हुए सुनता हूँ — “शिक्षा एक तलवार है। यह केवल ज्ञान नहीं देती, यह शक्ति देती है। लेकिन याद रखिए, यह दोधारी तलवार है। यदि इसे चरित्र और विनम्रता के साथ न चलाया जाए, तो यह समाज को घायल भी कर सकती है।”
उनका संदेश केवल पढ़-लिख जाने तक सीमित नहीं था। वे चेतावनी दे रहे थे कि शिक्षा का उद्देश्य अहंकार पैदा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को नैतिक बनाना है। यदि कोई व्यक्ति शिक्षित होकर भी चरित्रहीन है, विनम्रता से रहित है, तो वह अज्ञान से भी अधिक खतरनाक हो सकता है। ऐसा शिक्षित व्यक्ति समाज के लिए निर्माणकर्ता नहीं, बल्कि विनाश का कारण बन सकता है।
मनमाड का वह सम्मेलन केवल एक भाषण नहीं था; वह सामाजिक परिवर्तन का घोष था। बाबासाहेब जानते थे कि शिक्षा ही मुक्ति का मार्ग है, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा के साथ नैतिकता, संवेदनशीलता और मानवता अनिवार्य है।
आज, जब डिग्रियाँ बढ़ रही हैं और जानकारी आसानी से उपलब्ध है, तब यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। हमें खुद से पूछना चाहिए — क्या हमारी शिक्षा हमें बेहतर इंसान बना रही है? क्या उसमें चरित्र और विनम्रता जुड़ी है?
12 फ़रवरी 1938 का वह स्वर आज भी गूंजता है — शिक्षा लो, संगठित हो, संघर्ष करो; पर अपनी शिक्षा को मानवता की सेवा का साधन बनाओ, अहंकार का हथियार नहीं।
संकलन:-
बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया (भारतीय बौद्ध महासभा) राजस्थान (दक्षिण)

