मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन की राह में चलते हुए कभी पैर में कांटा चुभ जाए, तो हर कदम दर्दनाक हो जाता है। जब तक वह कांटा पैर के भीतर रहता है, इंसान ना तो ठीक से खड़ा हो पाता है और ना ही अपनी यात्रा का आनंद ले पाता है, लेकिन जैसे ही वह नन्हा सा कांटा बाहर निकलता है, जो सुकून और ‘मजा’ चलने में आता है, वह अवर्णनीय है। ठीक यही स्थिति हमारे जीवन में ‘माया’ और ‘अहंकार’ की है।
यह कहावत हमें सिखाती है कि जीवन की असली खूबसूरती बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि में है । जिस तरह कांटा निकलने पर पैर सहजता से चल पाते हैं, उसी तरह जब हम माया और अहंकार के बोझ से मुक्त हो जाते हैं, तभी हम जीवन को सही मायने में जी पाते हैं और हर पल का आनंद उठा पाते हैं । यह आत्म-बोध और वैराग्य की ओर इशारा करती है, जो सच्चे सुख का मार्ग है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

