Thursday, February 26, 2026
Homeहिमाचल प्रदेशग्राम शामलात संशोधन अधिनियम 2001 के खिलाफ एकजुट हुआ हिमाचल का दलित...

ग्राम शामलात संशोधन अधिनियम 2001 के खिलाफ एकजुट हुआ हिमाचल का दलित समाज

गिरिपार अनुसूचित जाति अधिकार संरक्षण समिति द्वारा हाई कोर्ट में दायर याचिका, संवैधानिक और सामाजिक न्याय पर गंभीर सवाल डॉ. नीरज कुमार/ मूकनायक/ हिमाचल प्रदेश में हिमाचल प्रदेश ग्राम शामलात भूमि (वेस्टिंग एवं उपयोग) अधिनियम, 1974 में किए गए संशोधन अधिनियम 2001 के विरुद्ध दलित समुदाय का असंतोष अब एक संगठित संवैधानिक संघर्ष में बदल चुका है। गिरिपार अनुसूचित जाति अधिकार संरक्षण समिति ने इस संशोधन को असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और भूमि सुधार कानूनों की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी है। यह मामला केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय और दलित समुदाय के ऐतिहासिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। मुख्य आधार: क्यों असंवैधानिक और पक्षपातपूर्ण है 2001 का संशोधन? 1. धारा 3(2)(d): 1950 के कथित मूल मालिकों को विशेष लाभ: संशोधन की धारा 3(2)(d) के माध्यम से वर्ष 1950 के तथाकथित मूल मालिकों को पुनः अधिकार दिए गए, जबकि दशकों से जमीन पर काबिज वास्तविक काश्तकार और सामाजिक रूप से वंचित दलित वर्ग को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यह प्रावधान अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है। 2. संशोधन का मनमाना और गलत क्रियान्वयन याचिका में यह भी आरोप है कि संशोधन को जमीन पर सही ढंग से लागू ही नहीं किया गया। जो भूमि सरकार में निहित (Vesting) रहनी थी, उसे भी प्रभावशाली लोगों में अवैध रूप से बांट दिया गया। यह न केवल कानून की अवहेलना है, बल्कि राज्य के सार्वजनिक संसाधनों की खुली लूट को दर्शाता है। 3.लैंड सीलिंग अधिनियम 1972 की मूल भावना का उलट हिमाचल प्रदेश भूमि सीमा निर्धारण (Land Ceiling) अधिनियम, 1972 का उद्देश्य था कि अतिरिक्त भूमि लेकर भूमिहीन और गरीब वर्गों को वितरित की जाए। लेकिन 2001 का शामलात संशोधन इस नीति का पूरी तरह उल्टा है, जिसमें भूमि सुधार की जगह भूमि पुनः केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया गया। 4.1972 के बाद काश्तकारी अधिनियम से बने मालिकों के अधिकारों का हनन 1972 के बाद काश्तकारी अधिनियम के तहत जिन गैर-मौरूसी काश्तकारों को कानूनी रूप से मालिक बनाया गया, 2001 का संशोधन उन्हें शामलात भूमि पर किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं देता। यह स्थिति कानूनी विरोधाभास और संवैधानिक अन्याय को जन्म देती है। 5. 1974 के मूल अधिनियम की भावना से विचलन हिमाचल प्रदेश ग्राम शामलात भूमि अधिनियम, 1974 का मूल उद्देश्य था कि ग्राम की साझा भूमि गरीब, भूमिहीन और अनुसूचित जाति वर्गों के कल्याण में उपयोग हो। 2001 का संशोधन इस उद्देश्य को कमजोर करता है और अलॉटेबल पूल जैसी व्यवस्थाओं को निष्प्रभावी बनाकर दलित समुदाय को बेदखली के कगार पर खड़ा कर देता है। गिरिपार से उठी न्याय की आवाज गिरिपार अनुसूचित जाति अधिकार संरक्षण समिति का कहना है कि यह संघर्ष केवल गिरिपार या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के दलित समाज के भविष्य से जुड़ा है। याचिका में मांग की गई है कि— 2001 के संशोधन को असंवैधानिक घोषित किया जाए, दशकों से काश्त कर रहे दलित परिवारों को कानूनी संरक्षण व नियमितीकरण मिले, 1974 के मूल अधिनियम की सामाजिक न्याय आधारित भावना बहाल की जाए।ग्राम शामलात संशोधन अधिनियम 2001 ने हिमाचल प्रदेश में भूमि सुधार, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। अब यह तय करना न्यायपालिका के हाथ में है कि संविधान की आत्मा बचेगी या ऐतिहासिक अन्याय को वैधानिक जामा पहनाया जाएगा।

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments