मूकनायक/ बुद्धप्रकाश बौद्ध लेखक एवं पत्रकार
किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज की पहचान उसके नागरिकों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से होती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ एक ओर शारीरिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर नकारात्मक सोच, तनाव और भ्रम भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में खेलकूद के साथ-साथ वैज्ञानिक सोच और सद्विचारों का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। खेलकूद मानव जीवन का अभिन्न अंग है। नियमित खेल गतिविधियाँ शरीर को स्वस्थ, चुस्त और ऊर्जावान बनाए रखती हैं। चिकित्सकों और विद्वानों के अनुसार खेल न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, बल्कि हृदय, मस्तिष्क और मांसपेशियों को भी मजबूत करते हैं।
प्राचीन दार्शनिक अरस्तू का कथन— “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है”— आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।जब शरीर स्वस्थ रहता है, तब मस्तिष्क में रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। खेल के दौरान शरीर से निकलने वाले सकारात्मक हार्मोन तनाव, अवसाद और चिंता को कम करते हैं। इससे व्यक्ति मानसिक रूप से संतुलित, आत्मविश्वासी और सकारात्मक बनता है।
हालाँकि केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही समग्र विकास संभव नहीं है। मानसिक शांति, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी उतने ही आवश्यक हैं। समाज में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने और पाखंडवाद व अंधविश्वास को समाप्त करने के लिए ऐसी पुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है, जो तर्क, विवेक और मानवतावादी मूल्यों को मजबूत करें।इस संदर्भ में गौतम बुद्ध, बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, पेरियार रामसामी नायकर, संत कबीर, ललई सिंह यादव, राहुल सांकृत्यायन, रामशरण शर्मा, ओमप्रकाश वाल्मीकि और डी.एन. झा जैसे विचारकों, लेखकों और समाज सुधारकों के विचार आज भी मार्गदर्शक हैं। इन महान व्यक्तित्वों ने समाज को अंधविश्वास, जातिवाद और असमानता से मुक्त करने के लिए तर्कशील और वैज्ञानिक चेतना को आगे बढ़ाया।
वर्तमान समय में भी डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात’, जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय, श्यौराज सिंह बेचैन, सुशीला टांकभोरे, सूरजपाल चौहान, माताप्रसाद , डॉ. धर्मवीर सहित अनेक लेखक अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक न्याय, समता और विवेकपूर्ण सोच को सशक्त कर रहे हैं। इनके विचारों का अध्ययन नई पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है।सद्विचारों के प्रसार में पुस्तकों और पुस्तकालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तकें व्यक्ति की सच्ची मित्र होती हैं, जो उसे सही और तार्किक दिशा प्रदान करती हैं। इसलिए नगरों और कस्बों में सार्वजनिक पुस्तकालयों का विस्तार समय की मांग है, ताकि आमजन तक ज्ञान की सहज पहुँच सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि खेल स्वस्थ शरीर का निर्माण करते हैं, जबकि पुस्तकें और सद्विचार स्वस्थ मस्तिष्क का। जब शरीर, विचार और विवेक—तीनों स्वस्थ होते हैं, तभी एक जागरूक, समतामूलक और प्रगतिशील समाज की नींव मजबूत होती है। आज आवश्यकता है कि हम खेल, ज्ञान और वैज्ञानिक सोच—इन तीनों को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। ( लेखक लंबे समय से पत्रकार हैं और उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर से पत्रकारिता और हिंदी में मास्टर डिग्री की है।)

