Thursday, February 26, 2026
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दूषित विचार हमारी चेतना को प्रदूषित कर भीतर की शांति को लेते हैं छीन

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मन जिस रंग को अपनाता है, उसी में रंग जाता है । प्रेम का रंग उसे कोमल और दयामय बना देता है, जबकि क्रोध का रंग उसे उग्र और बेचैन कर देता है। अनजाने में हम हर दिन अपने मन को रंगते रहते हैं। हर विचार, हर अनुभव उसकी दीवारों पर एक नई परत चढ़ा देता है। समय के साथ ये परतें इतनी मोटी हो जाती हैं कि हमारा असली स्वभाव, शांत, निर्मल और आनंदमय ढ़़क जाता है । स्वस्थ मन की पहचान है अशांति। स्वस्थ मन शांत झील की तरह स्थिर रहता है, जबकि अस्वस्थ मन तूफानी समुद्र की तरह किसी भी छोटी बात से मचल उठता है। एक ताना, एक असफलता, या एक डरावना विचार उसे लंबे समय तक विचलित कर सकता है।
यह अशांति केवल मन तक सीमित नहीं रहती – यह हमारे शारीर, व्यवहार, संबंधों और पूरे जीवन को प्रभावित करती है। धीरे-धीरे मन में असंतोष का विष फैलने लगता है। दूसरों का जीवन बेहतर लगता है और अपना तुच्छ । यह खालीपन कभी भरता नहीं है। मन यह भूल जाता है कि आनंद भीतर से उपजता है, बाहरी परिस्थितियों से नहीं । इसलिए पहला कदम अपने भीतर झॉंकना है । बिना किसी निर्णय के यह देखना कि मन में क्या चल रहा है। यह साधना एक दिन का काम नहीं है, लेकिन धैर्य और जागरूकता के साथ जब हम विचारों का चुनाव करने लगते है, तो मन धीरे-धीर शांत होने लगता है और जब मन स्वस्थ होता है, तो जीवन अपने आप सुंदर बन जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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