Thursday, February 26, 2026
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क्रांतिकारी भंते विनयाचार्य का बालाघाट में हुआ भव्य स्वागत:धम्म ध्वज यात्रा और महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन को मिला नया आयाम

मूकनायक/ आकाश घरडे़
बालाघाट /मध्य प्रदेश

22 सितंबर का दिन बालाघाट के लिए ऐतिहासिक महत्व लेकर आया। इस दिन क्रांतिकारी धम्म उपदेशक भंते विनयाचार्य का जिले के आंबेडकर चौक पर पुष्प गुच्छ एवं माला से भव्य स्वागत हुआ। उनके आगमन ने न केवल बौद्ध समाज को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान की, बल्कि न्याय, समानता और मानवता की नई चेतना को भी जन्म दिया। इस अवसर पर धम्मा ध्वज यात्रा का आयोजन किया गया, जिसने पूरे नगर को बौद्ध धम्म की करुणा, शांति और समता के संदेश से आलोकित कर दिया।


धम्मा ध्वज यात्रा आंबेडकर चौक से शुरू हुई और नारों के साथ नगर भ्रमण करते हुए नूतन कला निकेतन सभागृह पहुंची।

बालाघाट की सड़कों पर जब सैकड़ों अनुयायी धम्म ध्वज लिए आगे बढ़े तो वातावरण “जय भीम, जय बुद्ध” के नारों से गूंज उठा। भगवा धम्म ध्वज न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व का प्रतीक भी है। यात्रा का उद्देश्य समाज में भेदभाव, अन्याय और विषमता के खिलाफ एकजुटता प्रदर्शित करना और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर व तथागत भगवान बुद्ध के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना रहा।

भंते विनयाचार्य ने इस यात्रा को संबोधित करते हुए कहा—
“धम्म का मार्ग ही सच्ची स्वतंत्रता और समानता का मार्ग है। जब तक समाज बौद्ध धम्म की मूल भावना को नहीं समझेगा, तब तक वास्तविक न्याय संभव नहीं है।”


महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन : अस्मिता की पुकार

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण था महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन का उल्लेख। भंते विनयाचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि करोड़ों बौद्धों की आस्था और अस्मिता का केंद्र है। दुर्भाग्यवश यह पवित्र धरोहर आज भी अपने वास्तविक उत्तराधिकारियों से वंचित है।

उन्होंने कहा—
“जब तक महाबोधि महाविहार को बौद्ध समाज को पूर्ण रूप से नहीं सौंपा जाएगा, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा। यह संघर्ष केवल इमारत के लिए नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता, हमारी धरोहर और हमारे आत्मसम्मान के लिए है।”


दि बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया की भूमिका

इस ऐतिहासिक आयोजन में दि बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया की जिला शाखा बालाघाट के
प्रदेश अध्यक्ष चरणदास डेंगरे ने कहा कि महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन को नई दिशा और मजबूती मिल रही है। यह आंदोलन न केवल बौद्ध समाज की आस्था और पहचान से जुड़ा है बल्कि सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक धरोहरों की स्वतंत्रता की मांग का भी प्रतीक बन चुका है।

चरणदास डेंगरे ने कहा कि महाबोधि महाविहार, जो भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति का पवित्र स्थल है, उसे वास्तविक बौद्ध अनुयायियों को सौंपा जाना चाहिए। वर्तमान में इस पर बाहरी नियंत्रण होना बौद्ध अनुयायियों की आस्था के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के बताए मार्ग पर चलकर, अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाया जा रहा है।

प्रदेश अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन केवल एक धार्मिक संघर्ष नहीं बल्कि समानता, न्याय और आत्मसम्मान की लड़ाई है। इसके लिए देशभर के बौद्ध अनुयायियों को एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।

आंदोलन के दौरान उपस्थित कार्यकर्ताओं ने भी एक स्वर में प्रतिज्ञा ली कि वे भगवान बुद्ध की शिक्षाओं, धम्म और बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरणा लेकर इस संघर्ष को सफल बनाएंगे।

सक्रिय भूमिका निभाई। संगठन की राष्ट्रीय संरक्षक महाउपसिका मीरा ताई आंबेडकर के मार्गदर्शन में धम्म अनुयायियों ने संगठनात्मक एकजुटता का परिचय दिया। सभा में स्थानीय पदाधिकारी, अनुयायी और युवा वर्ग बड़ी संख्या में शामिल हुए।

भंते विनयाचार्य का संदेश बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से गहराई से जुड़ा है। बाबा साहेब ने कहा था कि—
“बौद्ध धम्म ही मानवता को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कर सकता है, क्योंकि यह शांति, समता और करुणा का मार्ग है।”

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन वस्तुतः बाबा साहेब के उस सपने को साकार करने की दिशा में उठाया गया कदम है, जिसमें उन्होंने दलित, शोषित और वंचित समाज को उनकी अस्मिता और आत्मसम्मान लौटाने की बात कही थी।

बालाघाट में हुई इस धम्मा ध्वज यात्रा ने आम जनता को गहराई से प्रभावित किया। महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने उत्साहपूर्वक इसमें भाग लेकर यह संदेश दिया कि बौद्ध धम्म का पुनर्जागरण केवल उपदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुका है।

यात्रा के दौरान जगह-जगह पुष्प वर्षा कर लोगों ने स्वागत किया। धम्म गीतों और नारों ने वातावरण को ऊर्जा और सकारात्मकता से भर दिया।


भंते विनयाचार्य का संदेश : एकता ही शक्ति है

सभा के अंत में भंते विनयाचार्य ने कहा—
“जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक मुक्ति का मार्ग कठिन रहेगा। हमें विषमता, अन्याय और अंधविश्वास से लड़ने के लिए एकजुट होना होगा। बाबा साहेब का संदेश था – शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो। यही मार्ग हमें अपनाना है।”

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे धम्म और आंबेडकरवाद के आदर्शों को आत्मसात कर समाज में जागरूकता फैलाएं।

बालाघाट की इस धम्म यात्रा ने न केवल जिले को नई पहचान दी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक संदेश दिया कि बौद्ध समाज अब अपनी धरोहरों और अधिकारों के लिए जागरूक और सक्रिय है। महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक स्वरूप लेगा, और इसमें बालाघाट जैसी जगहों की भागीदारी इस संघर्ष को और मजबूत करेगी।

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